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Sunday, February 22, 2026

जिसे माँ ने ठुकराया, उसे दुनिया ने गले लगाया: नन्हे ‘पंच’ की आँखों में ममता की तलाश और उम्मीद की नई सुबह

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कभी-कभी प्रकृति ऐसे दृश्य रच देती है जो दिल को भीतर तक भिगो देते हैं। जापान के इचिकावा सिटी ज़ू में रहने वाला छह महीने का नन्हा बंदर ‘पंच’ आज सिर्फ एक जीव नहीं, बल्कि भावनाओं की जीवित कहानी बन चुका है। जुलाई 2025 में जन्मे इस मासूम को जन्म के तुरंत बाद उसकी माँ ने स्वीकार नहीं किया। एक शिशु के लिए इससे बड़ा आघात क्या हो सकता है—जिसे दुनिया में लाने वाली ही उससे मुँह मोड़ ले?

प्राइमेट संसार में माँ का स्पर्श जीवन का पहला सहारा होता है। वही सुरक्षा है, वही गर्माहट है, वही पहचान है। जब यह आधार छिन जाए, तो शिशु के भीतर एक अनकहा खालीपन घर कर जाता है। पंच के साथ भी यही हुआ। शुरुआती दिनों में वह असहाय-सा कोने में सिमटा रहता, कभी इधर-उधर भटकता, तो कभी अन्य बंदरों के पास जाने की कोशिश करता और डांट खाकर लौट आता।

तभी उसे मिला एक मुलायम ऑरंगुटान खिलौना—जिसे देखभाल करने वालों ने प्यार से “ओरा-मामा” नाम दिया। शायद किसी ने सोचा भी नहीं था कि यह खिलौना उसके लिए भावनात्मक जीवनरेखा बन जाएगा। लंबे, मुलायम रेशों वाले उस खिलौने को वह सीने से ऐसे चिपकाता है, मानो उसी में माँ की धड़कन खोज रहा हो। एक वायरल वीडियो में वह खिलौने का हाथ अपने सिर पर रखता है—जैसे कोई माँ बच्चे के बाल सहला रही हो। यह दृश्य देखकर अनगिनत लोगों की आँखें नम हो गईं।

सोशल मीडिया पर जब यह दृश्य सामने आया, तो दुनिया भर से संवेदनाओं की बाढ़ उमड़ पड़ी। लाखों लोगों ने उसकी कहानी साझा की। कई लोग सिर्फ उसे देखने और उसका हौसला बढ़ाने के लिए इचिकावा सिटी ज़ू पहुँचने लगे। एक दिन में सौ से अधिक दर्शक उसके बाड़े के सामने जमा हुए। कैमरों की चमक के बीच वह कभी खिलौना पकड़कर बैठा रहता, तो कभी साहस जुटाकर अपने झुंड की ओर कदम बढ़ाता।

शुरुआत आसान नहीं थी। दूसरे बंदरों ने उसे सहज स्वीकार नहीं किया। कभी हल्का धक्का, कभी डांट—हर कोशिश के बाद वह वापस अपने “ओरा-मामा” के पास लौट आता। लेकिन धीरे-धीरे कहानी बदलने लगी। अब वह झुंड के साथ खेलने लगा है, शरारत करता है, और डांट खाने के बाद भी भागकर फिर उन्हीं के बीच लौट आता है। यह बदलाव केवल व्यवहार का नहीं, बल्कि उसके भीतर जन्म ले रहे आत्मविश्वास का संकेत है।

एक मार्मिक दृश्य में एक बड़ा बंदर उसे अपने पास खींचकर गले लगाता दिखाई देता है। दूसरे वीडियो में कोई वयस्क बंदर उसकी ग्रूमिंग करता है। प्राइमेट समाज में ग्रूमिंग केवल सफाई नहीं, बल्कि अपनत्व की भाषा है—विश्वास का स्पर्श, रिश्ते का संकेत। यह बताता है कि पंच अब केवल दया का पात्र नहीं, बल्कि समूह का हिस्सा बनने की ओर अग्रसर है।

ज़ू प्रशासन ने आगंतुकों से संयम रखने की अपील की है, ताकि पंच की यह नाज़ुक सामाजिक यात्रा बिना दबाव के आगे बढ़ सके। अधिकारियों के अनुसार, झुंड ने कोई गंभीर आक्रामकता नहीं दिखाई है और पंच ने अद्भुत मानसिक दृढ़ता का परिचय दिया है। यह दृढ़ता ही उसकी असली ताकत बन गई है।

पंच की कहानी केवल एक चिड़ियाघर की घटना नहीं है। यह उस सच्चाई का आईना है कि अस्वीकृति अंत नहीं होती। कभी-कभी जिन्हें अपने सबसे करीबी से अपनापन नहीं मिलता, उन्हें दुनिया गले लगा लेती है। एक शिशु, जो माँ की गोद से वंचित रहा, आज लाखों दिलों की धड़कन बन चुका है।

यह कहानी हमें सिखाती है कि प्रेम का अर्थ केवल जैविक संबंध नहीं, बल्कि संवेदना और सहानुभूति है। एक मुलायम खिलौने से शुरू हुई यह यात्रा अब आत्मनिर्भरता और सामाजिक स्वीकृति की ओर बढ़ रही है। पंच आज भी अपने “ओरा-मामा” को साथ लेकर चलता है, लेकिन अब वह अकेला नहीं है। उसके आसपास एक झुंड है—और दूर कहीं, स्क्रीन के उस पार, पूरी दुनिया उसका हौसला बढ़ा रही है।

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