भरत चतुर्वेदी
कुछ लोग उर्दू के इतने खिलाफ हैं कि उनकी नींद भी शायद उर्दू के तकिए पर सोकर खराब हो जाती है। उन्हें उर्दू से इतनी शिकायत है कि शिकायत दर्ज कराने के लिए भी वे उर्दू के ही शब्द तलाशते हैं। ग़ज़ब का विरोध है—तलवार भी उर्दू की, म्यान भी उर्दू की, और ऐलान भी फर्राटेदार उर्दू में!

ये वही लोग हैं जो कहते हैं—“हमें उर्दू नहीं आती”, और फिर पूरे आत्मविश्वास से फरमाते हैं—“उर्दू हमारी तहज़ीब नहीं है”। अब कोई उनसे पूछे कि ये “तहज़ीब”, “फरमान”, “ऐतराज़”, “बयान”, “मुलाक़ात” और “ख़िलाफ़त” किस भाषा के मोती हैं, तो शायद जवाब भी उर्दू में ही आएगा—“भाई साहब, इतना बारीक सवाल मत पूछिए!”

इन महानुभावों का तर्क बड़ा साफ़ है—उर्दू विदेशी है, लेकिन उनके जज़्बात पूरी तरह देसी! उन्हें नहीं पता कि उर्दू न तो किसी मज़हब की बपौती है, न किसी सरहद की। उर्दू तो हिंदुस्तान की मिट्टी में पली-बढ़ी वो ज़बान है, जिसने गली से दरबार तक, आम से खास तक, सबको एक ही लफ्ज़ में पिरोया है।

सबसे मज़ेदार बात ये है कि उर्दू के खिलाफ जुलूस भी निकलता है तो नारे ऐसे लगते हैं मानो मिर्ज़ा ग़ालिब खुद माइक थामे खड़े हों। विरोध इतना शुद्ध है कि बिना उर्दू के एक वाक्य भी पूरा नहीं होता। सच कहा गया है—
जो उर्दू के खिलाफ हैं, वो दरअसल उर्दू से ही अपने डर का इज़हार कर रहे हैं।

हकीकत ये है कि उर्दू से नफरत करना आसान है, लेकिन उर्दू को छोड़ पाना नामुमकिन। क्योंकि उर्दू कोई किताब में बंद भाषा नहीं, ये हमारी बोलचाल, हमारी तहज़ीब और हमारी सोच में रची-बसी है।

आख़िर में बस इतना ही कहना है—
उर्दू से लड़ने वाले अक्सर ये भूल जाते हैं कि
हिंदुस्तानियत किसी एक भाषा से नहीं, बल्कि सभी भाषाओं के साथ जीने से बनती है।

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