डॉ प्रभात अवस्थी
समाज में व्यक्ति की पहचान उसके शब्दों से पहले उसके कर्मों से होती है, लेकिन शब्दों का महत्व भी कम नहीं। श्रेष्ठ व्यक्ति वही होता है जिसकी वाणी में विनम्रता हो और जिसके कार्यों में श्रेष्ठता दिखाई दे। यह सूत्र केवल नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि जीवन की वह कसौटी है जिस पर महान व्यक्तित्व खरे उतरते हैं।
विनम्र वाणी किसी व्यक्ति को छोटा नहीं बनाती, बल्कि उसे बड़ा बनाती है। जो व्यक्ति अपने ज्ञान, पद या सामर्थ्य का प्रदर्शन कठोर शब्दों से नहीं करता, वह दूसरों के मन में सम्मान अर्जित करता है। विनम्रता कमजोरी नहीं है; यह आत्मविश्वास की वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति को अपने महत्व को सिद्ध करने के लिए ऊंचे स्वर की आवश्यकता नहीं पड़ती। इतिहास साक्षी है कि जिन लोगों की वाणी सरल और सौम्य रही, वही लोगों के दिलों में स्थायी स्थान बना पाए।
लेकिन केवल मीठी वाणी से कोई श्रेष्ठ नहीं बनता। यदि शब्द मधुर हों और कर्म खोखले, तो ऐसी विनम्रता दिखावा बन जाती है। श्रेष्ठता का वास्तविक प्रमाण कर्मों में दिखाई देता है। कठिन परिस्थितियों में सही निर्णय लेना, अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना, और समाज के हित में निःस्वार्थ कार्य करना—यही श्रेष्ठ कर्म हैं। जो व्यक्ति बिना शोर किए बड़ा काम कर जाता है, वही वास्तव में महान कहलाता है।
वाणी और कर्म के इस संतुलन से ही नेतृत्व जन्म लेता है। एक सच्चा नेता आदेश नहीं देता, उदाहरण प्रस्तुत करता है। उसकी वाणी प्रेरणा देती है और उसके कार्य विश्वास पैदा करते हैं। ऐसे व्यक्ति के पास न तो अहंकार होता है और न ही दिखावे की भूख। वह जानता है कि शब्द क्षणिक प्रभाव डालते हैं, लेकिन कर्म स्थायी पहचान बनाते हैं।
आज के समय में, जहां आक्रामक भाषा और आत्मप्रचार को सफलता का पैमाना समझ लिया गया है, यह सिद्धांत और भी प्रासंगिक हो जाता है। समाज को ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो बोलने में संयम रखें और करने में साहस दिखाएं। जो विवाद से नहीं, विवेक से अपनी बात रखें और परिणाम अपने कर्मों से दें।
अंततः, श्रेष्ठ व्यक्ति वही है जिसकी वाणी से शांति झलके और जिसके कर्म से परिवर्तन हो। विनम्र शब्द और श्रेष्ठ कार्य—यही वह संयोजन है जो व्यक्ति को साधारण से असाधारण बनाता है और समाज को दिशा देता है।
वाणी में विनम्रता, कर्म में श्रेष्ठता ही महान व्यक्तित्व की पहचान


