
प्रशांत कटियार
लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश में करारी चोट खाने के बाद भारतीय जनता पार्टी अब ओबीसी सोशल इंजीनियरिंग को दोबारा मजबूत करने में जुटी है। इसी रणनीति के तहत कुर्मी समाज से आने वाले पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। उत्तर प्रदेश में कुर्मी समाज की आबादी करीब 8 से 10 प्रतिशत मानी जाती है और यादवों के बाद यह दूसरी सबसे बड़ी ओबीसी जाति है। यही वजह है कि 2024 में इस समाज का बड़े पैमाने पर समाजवादी पार्टी की ओर शिफ्ट होना बीजेपी के लिए सबसे बड़ा झटका साबित हुआ।आंकड़ों पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश की मौजूदा 403 सदस्यीय विधानसभा में कुर्मी समाज के करीब 42 विधायक हैं, जबकि लोधी समाज के लगभग 18 विधायक हैं। योगी सरकार में कुर्मी समाज से चार मंत्री बनाए गए हैं, वहीं लोधी समाज को अपेक्षाकृत कम और कमजोर मंत्रालय मिलने का आरोप लंबे समय से लगता रहा है। यही असंतुलन अब राजनीतिक नाराजगी का रूप लेता दिख रहा है।2024 के लोकसभा चुनाव में कुर्मी वोट बैंक का रुझान पूरी तरह बदलता नजर आया। समाजवादी पार्टी ने 27 ओबीसी उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें 10 कुर्मी थे। नतीजा यह रहा कि सपा के 37 सांसदों में से 20 ओबीसी और इनमें सबसे ज्यादा कुर्मी सांसद चुने गए। लखीमपुर खीरी में कुर्मी प्रत्याशी उत्कर्ष वर्मा ने केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र टेनी को 34 हजार से ज्यादा वोटों से हराया। बस्ती में राम प्रसाद चौधरी ने बीजेपी के लगातार दो बार के सांसद हरीश द्विवेदी को पराजित किया। फतेहपुर से नरेश उत्तम पटेल, प्रतापगढ़ से एसपी सिंह पटेल, अंबेडकर नगर से लालजी वर्मा और श्रावस्ती से राम शिरोमणि वर्मा की जीत ने यह साफ कर दिया कि कुर्मी समाज निर्णायक रूप से सपा के साथ खड़ा रहा।बीजेपी के लिए चिंता की बात सिर्फ चुनावी हार नहीं रही, बल्कि जमीन पर घटित घटनाओं ने भी कुर्मी समाज में नाराजगी बढ़ाई। लखीमपुर खीरी में कुर्मी विधायक के साथ मारपीट की घटना, अयोध्या और बलरामपुर से जुड़े प्रशासनिक विवाद, किसान आंदोलन के दौरान लखीमपुर कांड की स्मृतियां इन सबने मिलकर कुर्मी समाज में यह धारणा बनाई कि पार्टी और सरकार उनकी पीड़ा को गंभीरता से नहीं ले रही। इसी पृष्ठभूमि में बीजेपी का पारंपरिक कुर्मी वोट बैंक खिसकता चला गया।कुर्मी समाज को साधने के लिए पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाना बीजेपी की मजबूरी भी मानी जा रही है। पार्टी इससे पहले भी तीन बार कुर्मी नेताओं को प्रदेश अध्यक्ष बना चुकी है विनय कटियार, ओम प्रकाश सिंह और स्वतंत्र देव सिंह। साफ है कि बीजेपी जानती है कि बिना कुर्मी समर्थन के यूपी में ओबीसी राजनीति जीतना मुश्किल है।लेकिन इसी फैसले के साथ लोधी समाज में असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। तीन बार के सांसद मुकेश राजपूत, सात बार के सांसद और फायरब्रांड नेता साक्षी महाराज का आज तक मंत्री न बनना, पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के पौत्र संदीप सिंह को दोबारा कैबिनेट में जगह न मिलना ये सभी मुद्दे लोधी समाज के भीतर गहरे सवाल पैदा कर रहे हैं। इसके अलावा बीते कई दिनों तक मीडिया में बीएल वर्मा और धर्मपाल सिंह के नाम प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए चर्चा में रहे, लेकिन अंततः यह पद किसी और को मिल गया। कई बार के विधायक और मौजूदा मंत्री धर्मपाल सिंह को भी उत्तर प्रदेश सरकार में ठीक या प्रभावशाली मंत्रालय न मिलने को लेकर नाराजगी है।इस असंतोष को और हवा जतिन प्रसाद के उदाहरण से मिली। कांग्रेस से बीजेपी में आने के बाद उन्हें पहले उत्तर प्रदेश सरकार में पावरफुल मंत्री बनाया गया और फिर बहुत कम समय में केंद्र सरकार में भी मंत्री पद दे दिया गया। लोधी समाज के नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच यह तुलना तेजी से फैल रही है कि वर्षों से पार्टी के लिए संघर्ष करने वालों को सत्ता में सम्मान नहीं, जबकि नए आए नेताओं को तुरंत बड़ी जिम्मेदारियां मिल जाती हैं।इसी माहौल में लोधी समाज अब संगठित होने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। अखिल भारतीय लोधी कल्याण महासभा जैसे संगठनों के जरिए प्रदेश भर में कार्यक्रम किए जा रहे हैं। संगठन के संरक्षक पूर्व सांसद राजवीर सिंह राजू भैया हैं, जबकि उन्नाव सांसद साक्षी महाराज और फर्रुखाबाद सांसद मुकेश राजपूत इसके विस्तार में अहम भूमिका निभा रहे हैं। लोधी समाज में यह संदेश देने की कोशिश हो रही है कि अगर राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिला तो वे अपनी ताकत अलग तरीके से दिखाने को तैयार हैं।कुल मिलाकर बीजेपी के सामने स्थिति जटिल है। एक तरफ कुर्मी समाज को दोबारा जोड़ने के लिए बड़ा दांव चला गया है, क्योंकि ओबीसी वोट बैंक में यादवों के बाद सबसे ज्यादा प्रभाव कुर्मियों का है। दूसरी ओर लोधी समाज का बढ़ता असंतोष पार्टी के लिए नया सिरदर्द बनता जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में ओबीसी समाज अब किसी भी दल का स्थायी वोट बैंक नहीं रहा। सम्मान, प्रतिनिधित्व, टिकट और सत्ता में हिस्सेदारी इन्हीं मुद्दों पर भविष्य की राजनीति तय होगी। ऐसे में कुर्मी हिट करने की बीजेपी की कोशिश कितनी सफल होगी और क्या लोधी असंतोष किसी नए राजनीतिक गुल को जन्म देगा, यह आने वाले चुनावों में साफ दिखाई देगा।
लेखक दैनिक यूथ इंडिया के स्टेट हेड है।


