दिवास्वप्न’ की रोशनी में आज की शिक्षा व्यवस्था

0
59

प्रमोद दीक्षित मलय 

भारतीय शिक्षा साहित्य में कुछ ही ऐसी कृतियाँ हैं जो विद्यालय, शिक्षक, विद्यार्थी और समाज के आपसी रिश्तों को इतनी गहराई से समझने और समझाने का साहस करती हैं। गिजुभाई बधेका द्वारा लिखित ‘दिवास्वप्न’ ऐसी ही एक कालजयी पुस्तक है, जो बच्चों की दुनिया को उनके ही नजरिये से देखने की दृष्टि प्रदान करती है। यह पुस्तक केवल शैक्षिक प्रयोगों का दस्तावेज नहीं, बल्कि आनंद, स्वतंत्रता और मानवीय संवेदना से भरी शिक्षा की परिकल्पना है।
1909 में अफ्रीका से भारत लौटने के बाद गिजुभाई ने वकालत शुरू की, लेकिन अपने पुत्र के लिए उपयुक्त विद्यालय की तलाश ने उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में खड़ा कर दिया। उन्होंने देखा कि उस समय के विद्यालय डर, अनुशासन और दंड पर आधारित थे। बच्चों की स्वाभाविक जिज्ञासा और आनंद के लिए वहां कोई स्थान नहीं था। इसी पीड़ा ने उन्हें विश्व की विभिन्न शिक्षण पद्धतियों का अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया।
मारिया मोंटेसरी के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने ऐसे विद्यालय की कल्पना की, जहाँ बच्चों का मन, हृदय और हाथ—तीनों समान रूप से विकसित हों।
1918 में गिजुभाई ने अपने साथियों के साथ दक्षिणामूर्ति बालमंदिर की स्थापना की। शिक्षक के रूप में मिले अनुभवों को उन्होंने ‘दिवास्वप्न’ के रूप में समाज के सामने रखा। लगभग एक सदी पहले उन्होंने विद्यालय को एक आनंदघर के रूप में देखने का स्वप्न देखा और तमाम प्रशासनिक बाधाओं, आलोचनाओं और चुनौतियों के बावजूद उसे व्यवहार में उतारने का प्रयास किया।
जब गिजुभाई अपने शैक्षिक प्रयोगों की अनुमति लेने अधिकारियों के पास गए, तो उन्हें चेतावनी दी गई कि वर्षांत परीक्षा ही उनके काम का मूल्यांकन करेगी। यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
आज भी हमारी शिक्षा व्यवस्था अंक आधारित परीक्षा प्रणाली से मुक्त नहीं हो पाई है। यह व्यवस्था बच्चों की मौलिक सोच, अनुभव आधारित समझ और स्वतंत्र अभिव्यक्ति को सीमित कर देती है। रटंत विद्या को बढ़ावा देती है और तर्क, विश्लेषण, कल्पना व वैज्ञानिक सोच के विकास में बाधा बनती है।
बच्चे ऊर्जा और जिज्ञासा से भरे होते हैं। उनके साथ काम करना केवल पाठ पढ़ाना नहीं, बल्कि निरंतर सीखने की प्रक्रिया है। गिजुभाई स्वीकार करते हैं कि कक्षा में पूर्व नियोजित योजनाएँ अक्सर विफल हो जाती हैं और शिक्षक को तत्काल नए रास्ते खोजने पड़ते हैं।
उनके शब्दों में— “घर बैठकर बनाई गई योजनाएँ कक्षा में लोहे के चने चबाने जैसी हो जाती हैं।”
यह स्वीकारोक्ति एक संवेदनशील शिक्षक की ईमानदारी को दर्शाती है।
आज भी यह दृश्य आम है कि छुट्टी की घंटी बजते ही बच्चों के चेहरे खिल उठते हैं, मानो वे किसी बंधन से मुक्त हो गए हों। यह सवाल उठाता है कि क्या विद्यालय बच्चों के लिए आनंद का स्थान बन पाए हैं?
नीतियों, आयोगों और योजनाओं के बावजूद कक्षाएं आज भी पारंपरिक, बोझिल और परीक्षा-केंद्रित बनी हुई हैं। गिजुभाई इसके विकल्प के रूप में कहानी, कविता, खेल और भ्रमण को सीखने के मूल माध्यम मानते हैं।
आज शिक्षक पाठ्यक्रम पूरा करने, रिपोर्ट बनाने और गैर-शैक्षिक कार्यों में उलझे हुए हैं। बच्चों की समझ, रुचि और सीखने की प्रक्रिया पर संवाद करने का समय उनके पास नहीं है।
इस स्थिति में शिक्षक भी एक तरह से बंधन में हैं। शिक्षा का उद्देश्य सूचना देना बनकर रह गया है, समझ विकसित करना नहीं।
बच्चों की शिक्षा में आज जो सामाजिक और बौद्धिक क्षति हो रही है, उसका प्रभाव आने वाले समय में पूरे समाज और राष्ट्र पर पड़ेगा। ‘दिवास्वप्न’ नीति-निर्माताओं को यह चेतावनी देता है कि यदि विद्यालयों में जीवन और आनंद नहीं होगा, तो शिक्षा केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी।
गिजुभाई पुस्तकालयों को शिक्षा का अनिवार्य अंग मानते हैं। वे सुझाव देते हैं कि हर वर्ष नई पाठ्यपुस्तकें खरीदवाने के बजाय अच्छे साहित्य से समृद्ध पुस्तकालय बनाए जाएं। पुस्तकों का पुनः उपयोग हो, जिससे पर्यावरण और संसाधनों—दोनों की रक्षा हो।
अभिभावकों की भागीदारी पर उनका अनुभव आज भी उतना ही प्रासंगिक है। पहली पीढ़ी के शिक्षार्थियों के माता-पिता आजीविका के दबाव में विद्यालय से दूरी बनाए रखते हैं।
आज भी कई रचनाधर्मी शिक्षक तमाम कठिनाइयों के बावजूद बेहतर विद्यालय का सपना संजोए हुए हैं। ‘दिवास्वप्न’ ऐसे शिक्षकों के लिए मार्गदर्शक बन सकती है।
यदि हम बच्चों को डर नहीं, आनंद; रटंत नहीं, समझ; और बोझ नहीं, उत्सव दे सकें—तो विद्यालय वास्तव में समाज के प्राण केंद्र बन सकते हैं।
यही ‘दिवास्वप्न’ की सबसे बड़ी सीख है—शिक्षा, जो जीवन से जुड़ी हो और जीवन को सुंदर बनाए।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here