
शरद कटियार
मानव इतिहास पर दृष्टि डालें तो यह तथ्य बार-बार सामने आता है कि मनुष्य ने मनुष्य का शोषण किया है। कभी लिंग, जाति, धर्म और नस्ल के नाम पर, तो कभी शारीरिक शक्ति, आर्थिक सामर्थ्य, संगठनात्मक क्षमता और राजनीतिक प्रभुत्व के आधार पर। शक्तिशाली राष्ट्रों और वर्गों ने सदैव कमजोर, गरीब और असहाय समुदायों को दबाने और उनका दोहन करने का प्रयास किया है। अशिक्षा और गरीबी इस शोषण की सबसे बड़ी जमीन रही है।
तथाकथित सभ्य और शिक्षित समाजों में भी यह सच्चाई देखने को मिलती है कि कमजोर वर्गों को गुलामों, बंधुआ मजदूरों और सस्ते श्रमिकों के रूप में इस्तेमाल किया गया। जमींदारों ने किसानों का शोषण किया, उद्योगपतियों ने मजदूरों से न्यूनतम मजदूरी पर अधिकतम श्रम लिया, साहूकारों और पूंजीपतियों ने ऊंची ब्याज दरों के जरिए गरीबों को कर्ज के जाल में फंसाया। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने विकासशील देशों से सस्ते श्रम और कच्चे माल का दोहन कर अपने मुनाफे बढ़ाए।
शोषण की यह प्रवृत्ति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक पतन का भी प्रमाण है। यहां तक कि जब सहायता या दान किया जाता है, तो उसके पीछे भी अक्सर नाम, यश, प्रतिष्ठा या भविष्य के लाभ की छिपी आकांक्षा होती है। निःस्वार्थ प्रेम, करुणा और संवेदना से किया गया त्याग दुर्लभ होता जा रहा है। यही कारण है कि धन, तकनीक, संसाधन, सैन्य शक्ति और राजनीतिक प्रभाव बार-बार कमजोरों को कुचलने के औजार बन जाते हैं।
शोषण का परिणाम केवल पीड़ा और असंतोष नहीं, बल्कि सामाजिक अशांति, हिंसा और अराजकता भी है। प्रश्न यह है कि क्या मानवता को इस दुष्चक्र से मुक्त किया जा सकता है? इसका उत्तर केवल आर्थिक या राजनीतिक सुधारों में नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना में निहित है। जब तक शोषण के स्थान पर सार्वभौमिक प्रेम, करुणा और सहयोग की भावना विकसित नहीं होगी, तब तक स्थायी शांति संभव नहीं है।
यह भावना केवल मूल्य-आधारित शिक्षा के माध्यम से ही विकसित की जा सकती है। ऐसी शिक्षा, जो केवल सूचना और कौशल तक सीमित न हो, बल्कि मनुष्य के हृदय को भी परिष्कृत करे। प्रेम, सहानुभूति, उत्तरदायित्व और नैतिक विवेक को जाग्रत किए बिना अपराध, हिंसा और असमानता पर नियंत्रण संभव नहीं है। मूल्य शिक्षा के बिना मानवाधिकारों की चर्चा भी खोखली प्रतीत होती है।
आज दुनिया भर में सरकारें और संस्थाएं संघर्ष समाधान, सुरक्षा और शांति के नाम पर खरबों रुपये खर्च कर रही हैं, फिर भी शोषण समाप्त नहीं हो रहा। इसका कारण यह है कि इन प्रयासों में नैतिक और भावनात्मक शिक्षा का अभाव है। सत्ता में बैठे लोग अक्सर यह भूल जाते हैं कि वास्तविक प्रगति, स्थायी शांति और सामूहिक सुख का आधार चरित्र निर्माण और भावनात्मक प्रशिक्षण है।
मूल्य-आधारित शिक्षा व्यक्ति में सही और गलत के बीच चुनाव करने की क्षमता विकसित करती है। यह सहानुभूति, जिम्मेदारी और भावनात्मक बुद्धिमत्ता को मजबूत करती है, जिससे व्यक्ति न केवल अपने लिए, बल्कि समाज और मानवता के लिए भी सकारात्मक योगदान दे सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा को केवल रोजगार का साधन न मानकर मानव निर्माण का माध्यम बनाया जाए। जब तक शिक्षा प्रेम, करुणा और नैतिकता को केंद्र में नहीं लाएगी, तब तक शोषण के नए-नए रूप जन्म लेते रहेंगे।
निष्कर्षतः, एक सभ्य, समरस और शांतिपूर्ण दुनिया के निर्माण के लिए मूल्य-आधारित शिक्षा कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है। यही शिक्षा शोषण की जड़ों को समाप्त कर सकती है और मानवता को उसके वास्तविक अर्थ में मानवीय बना सकती है।





