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Sunday, April 12, 2026

उपयोगिता तक सीमित होते रिश्ते, यही बदलते समाज का एक कड़वा सच

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भरत चतुर्वेदी
आज का समाज तेजी से बदल रहा है। रिश्तों की परिभाषाएं भी अब भावनाओं से हटकर “उपयोगिता” के इर्द-गिर्द सिमटती नजर आ रही हैं। यह एक ऐसा सच है जिसे हर व्यक्ति कभी न कभी अपने जीवन में महसूस करता है, लेकिन अक्सर स्वीकार नहीं कर पाता।
कहा जाता था कि इंसान को उसके गुणों, उसके स्वभाव और उसके दिल से पहचाना जाता है। लेकिन अब यह धारणा धीरे-धीरे बदलती जा रही है। आज के दौर में किसी व्यक्ति की पहचान उसके “काम आने” की क्षमता से तय होने लगी है। जब तक आप किसी के लिए उपयोगी हैं, तब तक आप खास हैं, महत्वपूर्ण हैं, याद किए जाते हैं—और जैसे ही आपकी उपयोगिता खत्म होती है, आपकी अहमियत भी धीरे-धीरे कम होने लगती है।
यह बदलाव सिर्फ रिश्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि हर स्तर पर दिखाई देता है—दोस्ती में, परिवार में, सामाजिक दायरे में और यहां तक कि पेशेवर जीवन में भी। लोग अब दिल से नहीं, जरूरत से जुड़ते हैं। किसी का हालचाल पूछने के पीछे भी अक्सर कोई उद्देश्य छिपा होता है। और जब उद्देश्य पूरा हो जाता है, तो बातचीत भी धीरे-धीरे खत्म हो जाती है।
सबसे अधिक दर्द तब होता है जब यह व्यवहार अपनों से देखने को मिलता है। जिनके लिए आप हर समय खड़े रहे, जिनके लिए आपने अपने समय, अपनी भावनाओं और अपने संसाधनों को समर्पित किया—वही लोग एक दिन आपकी जरूरत खत्म होते ही दूर हो जाते हैं। यह दूरी सिर्फ भौतिक नहीं होती, बल्कि भावनात्मक रूप से भी एक खालीपन छोड़ जाती है।
लेकिन इस कड़वे सच के बीच एक और महत्वपूर्ण बात छिपी है—यह हमें आत्मनिर्भर बनना सिखाता है। यह सिखाता है कि खुद को इतना मजबूत बनाओ कि आपकी पहचान किसी की जरूरत पर निर्भर न रहे। आपकी उपयोगिता जरूर हो, लेकिन आपकी पहचान सिर्फ उसी तक सीमित न हो।
समाज चाहे जितना भी बदल जाए, एक चीज हमेशा स्थायी रहेगी—सच्चे रिश्तों की कीमत। भले ही ऐसे रिश्ते कम हों, लेकिन जब भी मिलें, उन्हें संभालकर रखना जरूरी है। क्योंकि वही रिश्ते होते हैं जो बिना किसी स्वार्थ के, बिना किसी अपेक्षा के आपके साथ खड़े रहते हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि हम खुद से यह सवाल करें—क्या हम भी उसी भीड़ का हिस्सा बन गए हैं जो लोगों को उनकी उपयोगिता से आंकती है? या हम अब भी उन चुनिंदा लोगों में शामिल हैं जो रिश्तों को दिल से निभाते हैं?
समाज बदल रहा है, लेकिन इंसान के पास अब भी विकल्प है—वह चाहे तो उपयोगिता से ऊपर उठकर इंसानियत को चुन सकता है। और शायद यही चुनाव उसे भीड़ से अलग बनाता है।

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