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Tuesday, April 7, 2026

कहां गए शांति के कपोत उड़ाने वाले?

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अशोक मधुप
वरिष्ठ पत्रकार
आज की दुनिया बारूद से धधक रही है। रूस-यूक्रेन से लेकर मध्य पूर्व के रेगिस्तानों तक, हर तरफ मिसाइलों की गूँज है। शांति की बाते अब सुनाई नही देतीं। शांति के कपोत उड़ाने वाले दिखाई देने बंद हो गए। युद्ध की विभिषिका के विरोध में प्रदर्शन करने और मोमबत्त्ती जलाने वाले अब सड़कों से गायब है। युद्ध के विरोध के स्वर धीमे ही नही हुए ,पूरी तरह खामोश हो गए। बुद्ध के संदेश अब किताबों में ही बंद होकर रह गए है। युद्धों के विरोध की कही से बात नही उठ रही। दुनिया में शांति स्थित करने के लिए बने संयुक्त राष्ट्रसंघ के मुंह पर टेप चिपक गया। वह देख सकता है। न कुछ बोल सकता है। न आदेश कर सकता है।
विडंबना देखिए कि इक्कीसवीं सदी में हम मंगल पर बस्तियां बसाने की बात कर रहे हैं, लेकिन ज़मीन के चंद टुकड़ों और आपसी वर्चस्व के लिए हज़ारों बेगुनाहों का खून बहाने से भी पीछे नहीं हट रहे। युद्ध चाहे रूस और यूक्रेन के बीच हो, या इज़राइल, ईरान और अमेरिका के बीच का तनाव हो।जीत के झंडे चाहे जिस देश के हाथ आएं, हारती हमेशा मानवता है। इन युद्ध में विजयी कोई भी हो, सदा पराजित तो मानव होती है। मरती बस इंसानियत है।
इतिहास गवाह है कि युद्ध कभी समस्या का समाधान नहीं रहा, बल्कि यह नई समस्याओं का जन्मदाता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के समय भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कई बार कहा कि दुनिया को युद्ध की नही , बुद्ध की जरूरत है। कई मंचों से उन्होंने यह मांग उठाई, किंतु किसी भी देश ने शांति का समर्थन नही किया। सब देश गूंगे बन कर रह गए। आज भी ये ही हाल है। मरता ईरान खाड़ी के उन देशों पर मिजाइल और द्रोण दाग कर तबाही मचा रहा है, जिनमे अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं। अपनी बरबादी होते देख ये देश ईरान पर अमेरिकी हमलों का उस तरह विरोध नही कर रहे , जिस तरह कि करना चाहिए।
रूस-यूक्रेन युद्ध के समय जहाँ वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा संकट को जन्म दिया तो मध्य पूर्व (इज़राइल-हमास-ईरान) के संघर्ष ने दुनिया को धार्मिक और कूटनीतिक ध्रुवीकरण के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। इन लड़ाइयों में टैंकों की गड़गड़ाहट के बीच जो आवाज़ दब जाती है, वह है—एक मासूम बच्चे की चीख और एक बेबस माँ की कराह। युद्ध की सबसे बड़ी कीमत वे लोग चुकाते हैं जिनका राजनीति या सत्ता की लालसा से कोई लेना-देना नहीं होता। यूक्रेन के कीव से लेकर गाज़ा की गलियों और ईरान के गांव तक तक, हज़ारों औरतें और बच्चे मौत की नींद सो चुके हैं। जो उम्र खिलौनों से खेलने की थी, उस उम्र में बच्चे बमों के धमाकों को पहचानना सीख रहे हैं। हज़ारों बच्चे अनाथ हो चुके हैं और लाखों का भविष्य मलबे के नीचे दब गया है। युद्ध के दौरान महिलाओं को न केवल विस्थापन का दंश झेलना पड़ता है, बल्कि वे शारीरिक और मानसिक हिंसा का सबसे आसान लक्ष्य बनती हैं।
युद्ध केवल इंसान को नहीं मारता, वह सदियों से बनी-बनाई सभ्यताओं और बुनियादी ढांचे को भी नष्ट कर देता है। स्कूलों, अस्पतालों और रिहायशी इमारतों पर गिरते बम यह दर्शाते हैं कि आधुनिक समाज कितना “असंवेदनशील” हो चुका है। जब एक अस्पताल पर मिसाइल गिरती है, तो वह केवल ईंट-पत्थर की इमारत नहीं ढहती, बल्कि इंसानियत की आखिरी उम्मीद भी टूट जाती है। इन लड़ाइयों का असर केवल युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं है। रूस-यूक्रेन संघर्ष ने दुनिया भर में अनाज की आपूर्ति श्रृंखला को तोड़ दिया। इससे गरीब देशों में भुखमरी का खतरा बढ़ गया। ईंधन की बढ़ती कीमतें और खाद्य पदार्थों की कमी ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। जो खरबों डॉलर शिक्षा, स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन से लड़ने में खर्च होने चाहिए थे, वे आज आधुनिक हथियार और मिसाइलें बनाने में झोंके जा रहे हैं।
युद्ध का एक और खामोश शिकार हमारा पर्यावरण है। हज़ारों टन गोला-बारूद का इस्तेमाल वायुमंडल को ज़हरीला बना रहा है। जंगलों की आग, समुद्री प्रदूषण और ज़मीन में धंसे बारूदी सुरंग आने वाली कई पीढ़ियों के लिए मौत का जाल बिछा रहे हैं। हम जिस धरती को बचाने की कसमें खाते हैं, उसी को युद्ध की आग में झोंक रहे हैं। संसाधनों को बरबाद कर रहे हैं।जब हम टीवी पर बमबारी के दृश्य देखते हैं और उन्हें केवल एक “न्यूज़ अपडेट” की तरह छोड़ देते हैं, तो समझ लीजिए कि हमारे भीतर की इंसानियत मर चुकी है। युद्ध हमें क्रूर बना देता है। हम मौतों को केवल ‘आंकड़ों’ में गिनने लगते हैं। घृणा का यह बीज जो आज बोया जा रहा है, वह भविष्य में और अधिक कट्टरपंथ और आतंकवाद को जन्म देगा।
अमेरिका आज दुनिया का सबसे बड़ा तानाशाह बन गया है। उसने इराक पर यह कह कर हमला किया था कि उसके पास कैमिकल और अन्य घातक शस्त्र है। इराक हार गया। सद्दाम हुसैन पकड़े ही नही गए, उन्हें फांसी हो गई, किंतु अमेरिका इराक से कुछ भी बरामद नही कर पाया। उसका सब झूंठा प्रचार रहा। अब ईरान पर यह कह कर इस्राइल और अमेरिका ने हमला किया कि वह परमाणु बम बनाने के नजदीक है। उसकी इस शक्ति को खत्म करना है। हमले जारी है। इस दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने मीडिया से बात करते हुए अपने मन की बात कह दी कि उसे ईरान के तेल पर कब्जा करना है। तीन जनवरी 2026 को अमेरिकी सेना ने एक सैन्य ऑपरेशन के दौरान वेनेजुयला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को उनके देश (कराकस) से गिरफ्तार किया है। यह कार्रवाई नार्को-आतंकवाद और मादक पदार्थों की तस्करी के आरोपों के बाद की गई। इसके बाद उन्हें न्यूयॉर्क लाया गया। बहाना मादक पदार्थो की तस्करी रोकना था किंतु अब अमेरिकी राष्ट्र पति ट्रंप कह रहे हैं कि वेनेजुयला का तेल वे बेचेंगे। उनकी मर्जी से बिकेगा। इस सब का मतलब साफ है कि दुनिया के संसाधनों पर अमेरिका की नजर है। वह किसी ने किसी बहाने उन पर कब्जा करना चाहता है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का एक बड़ा बयान सामने आया। ट्रंप ने कहा है कि अगर थोड़ा और समय मिला तो अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोल सकता है और वहां से तेल लेकर बड़ा मुनाफा कमा सकता है। उनके इस बयान ने पहले से चल रहे संघर्ष को और संवेदनशील बना दिया है।
फिलहाल ईरान ने इस अहम समुद्री रास्ते को बंद कर दिया है। इस कारण दुनिया भर में तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है और कीमतों में तेजी देखी जा रहीयह संघर्ष अब सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रहा है। अमेरिका और इस्राइल ने ईरान और लेबनान में कई ठिकानों पर हमले किए हैं। इसके जवाब में ईरान ने भी कई खाड़ी देशें पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। हाल के दिनों में हमलों की संख्या कुछ कम हुई है, लेकिन पूरी तरह रुकी नहीं है।
ईरान के खिलाफ कार्रवाई में शामिल होने से इन्कार करने वाले ब्रिटेन जैसे वह देश होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने की वजह से जेट ईंधन नहीं पा रहे हैं। उनके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रप का सुझाव है: पहला- अमेरिका से तेल खरीदो, हमारे पास बहुत है। दूसरा- हिम्मत जुटाओ, जलडमरूमध्य पर जाओ और उसे अपने कब्जे में ले लो।
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के पूर्व महानिदेशक मोहम्मद अल बारदेई ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के खिलाफ 48 घंटे का अल्टीमेटम जारी करने के बाद खाड़ी देशों से हस्तक्षेप करने की तत्काल अपील की है। पूर्व आईएईए प्रमुख ने विनाशकारी सैन्य टकराव की संभावना का जिक्र किया। बारदेई ने एक्स पर एक पोस्ट में पड़ोसी खाड़ी देशों को संबोधित करते हुए कहा, “कृपया, एक बार फिर अपनी पूरी ताकत झोंक दें, इससे पहले कि यह पागल शख्स इलाके को आग का गोला बना दे।”मोहम्मद अल बारदेई ने अपनी गुहार को वैश्विक मंच तक पहुंचाते हुए युद्ध को रोकने में अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों की भूमिका पर भी सवाल उठाया। संयुक्त राष्ट्र के साथ रूस-चीन-फ्रांस को संबोधित एक अलग पोस्ट में उन्होंने पूछा कि क्या इस पागलपन को रोकने के लिए कुछ भी नहीं किया जा सकता है?
युद्ध किसी समस्या का स्थायी हल नहीं है। इतिहास ने बार-बार सिखाया है कि युद्ध के मैदान में कभी कोई नहीं जीतता, बस जो कम हारता है वह खुद को विजेता घोषित कर देता है। रूस, यूक्रेन, इज़राइल, ईरान या अमेरिका—शक्ति का प्रदर्शन किसी को महान नहीं बनाता। महानता इस बात में है कि हम आने वाली पीढ़ी को एक ऐसी दुनिया दें जहाँ बारूद की गंध नहीं, बल्कि भाईचारे की मिठास हो। एक बार और अमेरिका वियतनाम और अफगानिस्तान में जाकर अपना अंजाम देख चुका है। बाद में बहुत कुछ गंवाकर वहां से भाग आया। ये ईरान है। यहां के गांव वाले, युवाओं और बच्चों ने भी अब शस्त्रों से दोस्ती कर ली है। हथियार संभाल लिए है। अमेरिका के दो हैलिकोप्टर को मार गिराने वाला एक मामूली गडरिया है। इस गडरिए को तो युद्ध कला भी नही आती । सिर्फ इतना जानता है कि ये हैलिकोप्टर हमलावर अमेरिका के है। जिस देश की जनता इतनी जुझारू और लड़ाका हो , जिसके गडरिये अमेरिका जैसे देश के दो− दो आधुनिकतम हैलिकोप्टर गिरा दें,उसे हराना संभव नहीं।
आज दुनिया के शक्तिशाली राष्ट्रों को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी । उन्हें युद्ध के उन्माद को रोकना होगा। नहीं रोका, तो वह दिन दूर नहीं जब ‘इंसान’ तो बचेगा, लेकिन उसके भीतर की ‘इंसानियत’ पूरी तरह दफन हो चुकी होगी। हमें यह समझना होगा कि धरती पर सरहदें हमने खींची हैं, कुदरत ने नहीं। शांति की मेज़ पर बैठकर बात करना कमज़ोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी बहादुरी है। वक्त आ गया है कि हम “हथियारों की होड़” को छोड़कर “मानवता की जोड़” पर ध्यान दें। वरना इतिहास हमें उन लोगों के रूप में याद रखेगा ,जिनके पास सब कुछ था, बस एक-दूसरे के लिए दया और प्रेम नहीं था।
अशोक मधुप
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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