डॉ. विजय गर्ग
आज के आधुनिक समाज में नौकरीपेशा महिलाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। वे न केवल घर का रखरखाव करती हैं, बल्कि आर्थिक रूप से मजबूत परिवार बनाने में भी महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। लेकिन इस योगदान के साथ उन्हें दोहरी जिम्मेदारियों का बोझ भी उठाना पड़ता है। एक तरफ कार्यालय की ड्यूटी और दूसरी तरफ घर की देखभाल।
नौकरीपेशा महिला की सुबह ज्यादातर दूसरों से पहले शुरू होती है। घर के सभी काम, बच्चों की देखभाल, खाना बनाना और फिर समय पर कार्यालय पहुंचना यह सब एक दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है। ऑफिस में भी उन्हें अपना काम पूरी जिम्मेदारी और ईमानदारी से करना पड़ता है। दिन भर की थकान के बाद भी वे घर आकर दोबारा घरेलू कार्यों में शामिल हो जाती हैं।
यह दोहरी जिम्मेदारी कभी-कभी महिलाओं के लिए मानसिक और शारीरिक दबाव का कारण बनती है। समय की कमी, अपने लिए समय न मिलना और सामाजिक अपेक्षाओं का बोझ उनके जीवन को चुनौतीपूर्ण बना देता है। फिर भी, वे हर कठिनाई का सामना अपनी हिम्मत और समर्पण से करते हैं।
समाज में अभी भी यह धारणा पूरी तरह से नहीं बदली है कि घरेलू काम केवल महिला की जिम्मेदारी है। यदि परिवार के अन्य सदस्य भी घरेलू कार्यों में भाग लेते हैं, तो नौकरीपेशा महिलाओं का जीवन काफी आसान हो सकता है। साथ ही, कार्यस्थल पर भी उनके लिए सुविधाएं और लचीले समय की व्यवस्था होनी चाहिए।
आज के समय में महिला सिर्फ घर की देखभाल तक ही सीमित नहीं रही। वह आसमान की ऊंचाइयों को छू रही है। चाहे वह विज्ञान, शिक्षा, बैंकिंग या राजनीति का क्षेत्र हो। लेकिन जब एक महिला घर से बाहर काम करने जाती है, तो उसकी जिम्मेदारियां कम होने के बजाय दोगुनी हो जाती हैं।
घर और कार्यालय के बीच संतुलन: एक नौकरीपेशा महिला के लिए दिन सूर्योदय से पहले शुरू होता है। रसोई का काम, बच्चों को तैयार करने और बुजुर्गों की देखभाल करने के बाद वह अपने कार्यालय के लिए रवाना होती है। कार्यालय में वह अपनी पूरी मेहनत और योग्यता के साथ काम करती है, लेकिन शाम को घर लौटने पर ही वह फिर से ‘गृहिणी’ की भूमिका में आ जाती है।
मानसिक और शारीरिक बोझ दोहरी भूमिका निभाते हुए महिलाएं अक्सर ‘सुपरवुमन” बनने की कोशिश करती हैं। इस दौड़ में वे अपने स्वास्थ्य और आराम को पीछे छोड़ देती हैं। थकान: पूरे दिन काम करने के बाद भी रात में घर के कामों की चिंता करना मानसिक थकान का कारण बनता है। अपराध बोध: कभी-कभी काम की व्यस्तता के कारण वे बच्चों को पूरा समय नहीं दे पाते, जिससे उन्हें अंदर से दोषी महसूस होने लगता है।
सामाजिक चुनौतियां हमारा समाज अभी भी पूरी तरह से मानसिक रूप से विकसित नहीं हुआ है। आज भी यह अपेक्षा की जाती है कि चाहे महिला कितनी भी बड़ी अधिकारी क्यों न हो, घर का सारा काम उसकी जिम्मेदारी होती है। कार्यस्थल पर भी कभी-कभी महिलाओं को पूर्वाग्रह या कम समझा जाने की चुनौती का सामना करना पड़ता है।
अंत में यह कहा जा सकता है कि नौकरीपेशा महिलाएं हमारे समाज की रीढ़ हैं। वे अपने घर और काम दोनों को अच्छी तरह से संभालती हैं। उनकी कुशलता, उत्साह और समर्पण हमें सिखाता है कि किसी भी कठिनाई को इरादे के बल से जीया जा सकता है। समाज का कर्तव्य है कि वह उनका सम्मान करे और उन्हें समान अधिकार और सुविधाएं प्रदान करे।
डॉ. विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य शैक्षिक स्तंभकार मलोट पंजाब


