
शरद कटियार
कभी-कभी ज़िंदगी हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है, जहाँ हम दूसरों को बचाते-बचाते खुद से हारने लगते हैं। चेहरे पर मुस्कान होती है, लेकिन भीतर एक सन्नाटा पल रहा होता है—एक ऐसा सन्नाटा जो हर दिन हमारी पहचान को थोड़ा-थोड़ा निगलता जाता है।
हम रिश्तों को निभाने के नाम पर, “हम” को बचाने के नाम पर, अपने “मैं” को गिरवी रख देते हैं। और यही सबसे बड़ी भूल होती है।
मतलबी दुनिया का सबसे खतरनाक सच
यह दुनिया उतनी मासूम नहीं है जितनी हम मान लेते हैं। यहां लोग आपके दिल की नहीं, आपकी उपयोगिता की कद्र करते हैं। जब तक आप उनके काम के हैं, आप “अपने” हैं… और जिस दिन आप खुद के लिए खड़े हो जाते हैं, उसी दिन आप “बदल गए” कहलाने लगते हैं।
सबसे दर्दनाक बात यह नहीं कि लोग बदल जाते हैं, बल्कि यह है कि हम खुद को बदलने लगते हैं—सिर्फ उन्हें खुश रखने के लिए।
हम अपनी सीमाएं तोड़ते हैं, अपनी आवाज दबाते हैं, अपने जज़्बातों को मारते हैं… और धीरे-धीरे अपने ही अंदर अजनबी बन जाते हैं।
‘हम’ का बोझ, ‘मैं’ की मौत
“हम” बहुत खूबसूरत शब्द है, लेकिन जब यह आपकी आत्मा पर बोझ बनने लगे, तो समझ लीजिए कुछ गलत हो रहा है।
जब आप हर बार खुद को समझाते हैं,“कोई बात नहीं, मेरे सहने से रिश्ता बच जाएगा…”तब असल में रिश्ता नहीं, सिर्फ आपकी सहनशीलता जिंदा रहती है… और आप अंदर से मरने लगते हैं।आत्मसम्मान कभी एक झटके में नहीं टूटता…यह धीरे-धीरे खत्म होता है—हर बार जब आप खुद को नजरअंदाज करते हैं, हर बार जब आप अपने दर्द को छोटा साबित करते हैं, हर बार जब आप अपनी कीमत किसी और की नजरों से तय करते हैं।
‘मैं’—आपका सबसे सच्चा साथी
इस दुनिया में अगर कोई हमेशा आपके साथ रहेगा, तो वो आप खुद हैं।और अगर आप ही खुद के साथ खड़े नहीं हो पाए, तो कोई और भी आपके लिए सच्चे दिल से नहीं खड़ा होगा।“मैं” होना अहंकार नहीं है…“मैं” होना अपने वजूद का सम्मान है।जब आप “न” कहना सीखते हैं, जब आप अपनी सीमाएं तय करते हैं, जब आप अपने दर्द को भी उतनी ही अहमियत देते हैं जितनी दूसरों की खुशी को—तब आप स्वार्थी नहीं, बल्कि जागरूक हो जाते हैं।
सच्चा संतुलन वही जहां ‘हम’ भी जिंदा रहे और ‘मैं’ भी, रिश्ते तब तक ही खूबसूरत हैं, जब तक उनमें आपकी इज्जत सलामत है।
जहां आपको बार-बार खुद को छोटा करना पड़े, वहां “हम” सिर्फ एक दिखावा बन जाता है।
सच्चा “हम” वही है, जहां आपका “मैं” भी सुरक्षित हो।
जहां आपको बदलने की नहीं, समझे जाने की जरूरत हो।
जहां आपकी खामोशी नहीं, आपकी आवाज सुनी जाए।
अंत में… एक कड़वा लेकिन जरूरी सच कि अगर आप खुद को नहीं बचाएंगे, तो यह दुनिया आपको पूरी तरह खत्म कर देगी—बिना कोई आवाज किए, बिना कोई निशान छोड़े।
इसलिए कभी-कभी “बुरा” कहलाना जरूरी है,
कभी-कभी “अकेला” रहना जरूरी है,कभी-कभी “ना” कहना जरूरी है…क्योंकि जो इंसान खुद को खो देता है,वो पूरी दुनिया पाकर भी खाली ही रहता है।“अपने आत्मसम्मान को इतना मजबूत बनाइए कि
कोई भी रिश्ता उसे तोड़ने की कीमत पर जरूरी न लगे।”


