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Thursday, April 2, 2026

घोर कलयुग है साहब,जहां इंसान खुद से भी दूर हो रहा

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शरद कटियार
समय बदलता है, यह प्रकृति का नियम है। लेकिन आज का समय केवल बदलाव नहीं, बल्कि संवेदनाओं के पतन का दौर बनता जा रहा है। यह वही कलयुग है, जहां इंसान अब इंसान के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ अपने विकास, अपनी पहचान और अपनी सफलता के लिए जी रहा है।
आज का समाज एक अजीब विडंबना से गुजर रहा है। जो व्यक्ति हमें चलना सिखाता है, जो हमारे जीवन के अंधेरे में दीपक बनता है, उसी से हम धीरे-धीरे दूरी बना लेते हैं। और आश्चर्य तो तब होता है, जब उसी के प्रति मन में ईर्ष्या जन्म लेने लगती है। यह ईर्ष्या केवल किसी की सफलता से नहीं, बल्कि उस सच्चाई से होती है, जो हमें हमारी वास्तविकता का आईना दिखा देती है।
आज लोग उस व्यक्ति से दूर भागते हैं, जो उन्हें सच्चाई दिखाता है, जो उनके जीवन को दिशा देता है। क्योंकि सच्चाई हमेशा आसान नहीं होती, वह सवाल पूछती है, आत्ममंथन कराती है। और शायद यही कारण है कि लोग अब सच्चाई से नहीं, बल्कि दिखावे से जुड़ना पसंद करते हैं।
दूसरी ओर, समाज में एक नया चलन तेजी से बढ़ रहा है—चमक-दमक के आगे नतमस्तक होने का। जिनके पास बाहरी आडंबर है, जिनकी जिंदगी सोशल मीडिया पर चमकती हुई नजर आती है, उनके आगे लोग सिर झुकाते हैं, उनकी चरण वंदना करते हैं। यह जानते हुए भी कि वह चमक अक्सर एक भ्रम है, एक मुखौटा है।
यह स्थिति केवल सामाजिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक गिरावट का प्रतीक है। इंसान अब दिल से नहीं, बल्कि तुलना और प्रतिस्पर्धा से जी रहा है। रिश्ते अब आत्मीयता से नहीं, बल्कि लाभ और प्रतिष्ठा से तय होने लगे हैं।
सबसे दुखद यह है कि हम उस व्यक्ति को भूल जाते हैं, जिसने हमारे जीवन को आकार दिया, जिसने हमें गिरने से बचाया। और उसी के प्रति हमारे मन में द्वेष या उपेक्षा जन्म ले लेती है। यह केवल कृतघ्नता नहीं, बल्कि हमारी आत्मा की थकान का संकेत है।
क्या यही विकास है? क्या यही पहचान है? यदि हमारी पहचान हमें अपने मूल्यों से दूर कर दे, यदि हमारी सफलता हमें अपनों से अलग कर दे, तो यह विकास नहीं, विनाश है।
आज जरूरत है रुककर सोचने की। यह समझने की कि जिंदगी केवल आगे बढ़ने का नाम नहीं, बल्कि साथ लेकर चलने का नाम है। जो हमें रास्ता दिखाए, उसका सम्मान करना ही सच्चा विकास है। और जो चमक केवल दिखावे की हो, उससे प्रभावित होना नहीं, बल्कि उसे समझना जरूरी है।
कलयुग का अंधेरा तभी कम होगा, जब हम अपने भीतर की रोशनी को पहचानेंगे। जब हम ईर्ष्या को छोड़कर कृतज्ञता को अपनाएंगे। जब हम दिखावे के बजाय सच्चाई के साथ खड़े होंगे।
क्योंकि अंत में, इंसान की असली पहचान उसकी सफलता नहीं, बल्कि उसके रिश्ते और उसके संस्कार होते हैं।

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