डॉ विजय गर्ग
आज के डिजिटल युग में, जहाँ हमारी आँखें अधिकतर समय स्मार्टफोन, लैपटॉप और टैबलेट की स्क्रीन पर टिकी रहती हैं, एक दिलचस्प चलन देखने को मिल रहा है—किताबों की ओर वापसी। सोशल मीडिया की भागदौड़ और सूचनाओं के सैलाब के बीच, लोग फिर से छपे हुए पन्नों की महक और किताबों के सुकून को अपना रहे हैं।
क्यों लौट रहे हैं लोग किताबों की ओर?
डिजिटल थकान ने लोगों को यह एहसास दिलाया है कि स्क्रीन से हटकर कुछ समय शांति से बिताना कितना जरूरी है। इसके पीछे कई ठोस कारण हैं:
गहन एकाग्रता: इंटरनेट पर हम अक्सर ‘स्क्रॉलिंग’ करते हैं, जिससे ध्यान भटकता है। किताब पढ़ना हमें एक ही विषय पर गहराई से सोचने और एकाग्र होने में मदद करता है।
मानसिक शांति: किताबों की दुनिया हमें वास्तविक जीवन के तनाव से दूर एक अलग संसार में ले जाती है। यह ध्यान का ही एक रूप है, जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है।
तथ्यात्मक स्पष्टता: इंटरनेट पर जानकारी का भंडार है, लेकिन अक्सर वह भ्रामक हो सकती है। किताबें, विशेषकर गैर-काल्पनिक पुस्तकें, किसी विषय पर अधिक प्रामाणिक और व्यवस्थित ज्ञान प्रदान करती हैं।
डिजिटल डिटॉक्स: लगातार नीली रोशनी के संपर्क में रहने के बाद, रात को सोने से पहले किताब पढ़ना आँखों को आराम देता है और नींद की गुणवत्ता में सुधार करता है।
नई पीढ़ी और किताबों का बढ़ता प्रेम
यह कहना गलत होगा कि आज की पीढ़ी केवल तकनीक की दीवानी है। वास्तव में, (टिकटॉक पर किताबों का समुदाय) और बुकस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्मों ने युवाओं में पढ़ने की रुचि को फिर से जिंदा किया है। किताबें अब केवल ज्ञान का जरिया नहीं, बल्कि एक ‘लाइफस्टाइल स्टेटमेंट’ भी बन गई हैं।
पिछले कुछ वर्षों में यह धारणा बन गई थी कि तकनीक के विस्तार के साथ किताबों का महत्व कम हो जाएगा। लोग स्क्रीन पर पढ़ना पसंद करेंगे और पुस्तकालयों की जगह डिजिटल प्लेटफॉर्म ले लेंगे। लेकिन अब स्थिति बदलती दिखाई दे रही है। युवा वर्ग, जो पहले अधिकतर समय मोबाइल पर बिताता था, अब किताबों के प्रति आकर्षित हो रहा है। पुस्तक मेलों में बढ़ती भीड़, ऑनलाइन और ऑफलाइन बुक स्टोर्स की बढ़ती बिक्री और पुस्तकालयों में फिर से लौटती रौनक इस बात का प्रमाण हैं।
किताबें केवल ज्ञान का स्रोत नहीं होतीं, बल्कि वे हमारे विचारों को गहराई देती हैं, कल्पनाशक्ति को विकसित करती हैं और जीवन के प्रति संवेदनशील बनाती हैं। एक अच्छी किताब पाठक को सोचने पर मजबूर करती है, उसे नए दृष्टिकोण देती है और मानसिक शांति भी प्रदान करती है। डिजिटल माध्यमों में जहाँ त्वरित जानकारी मिलती है, वहीं किताबें गहन समझ विकसित करने का अवसर देती हैं।
इस परिवर्तन के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है डिजिटल थकान। लगातार स्क्रीन पर समय बिताने से लोगों को मानसिक और शारीरिक थकान महसूस होने लगी है। ऐसे में किताबें एक शांत और सुकून भरा विकल्प बनकर उभर रही हैं। इसके अलावा, शिक्षा के क्षेत्र में भी किताबों के महत्व को फिर से समझा जा रहा है। शिक्षक और अभिभावक बच्चों को किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं ताकि उनका सर्वांगीण विकास हो सके।
सरकार और सामाजिक संस्थाएँ भी इस दिशा में प्रयास कर रही हैं। विभिन्न शहरों में पुस्तक मेले आयोजित किए जा रहे हैं, पुस्तकालयों का आधुनिकीकरण किया जा रहा है और पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं। यह पहल न केवल पढ़ने की आदत को बढ़ावा देती है, बल्कि समाज में बौद्धिक विकास की नींव भी मजबूत करती है।
हालाँकि, यह भी आवश्यक है कि किताबों के प्रति यह बढ़ती रुचि केवल एक अस्थायी प्रवृत्ति न बनकर स्थायी आदत में बदल जाए। इसके लिए परिवार, विद्यालय और समाज सभी को मिलकर प्रयास करने होंगे। बच्चों को बचपन से ही किताबों के साथ जोड़ना होगा और पढ़ने को एक आनंददायक अनुभव बनाना होगा।
अंततः, किताबों की ओर लौटता देश एक सकारात्मक संकेत है। यह न केवल ज्ञान के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि आधुनिकता के बीच हम अपनी जड़ों और मूल्यों को नहीं भूल रहे। किताबें हमेशा से हमारी सच्ची मित्र रही हैं और यह वापसी इस बात का प्रमाण है कि उनका महत्व कभी कम नहीं हो सकता।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब


