मिट्टी के घर और पत्थर की दुनिया

0
49

शिवानी श्रेयानी

हम तो मिट्टी से घर बनाने में लगे थे,
पर ये भूल गए पत्थर से बने घर ही काम आते हैं।

ये पंक्तियाँ केवल घर बनाने की बात नहीं करतीं, बल्कि यह पूरे जीवन-दर्शन, रिश्तों और समाज की सोच पर गहरा प्रहार करती हैं। यह उस इंसान की पीड़ा है जो भावनाओं, विश्वास, प्रेम और अपनापन जैसी “मिट्टी” से अपनी दुनिया बनाना चाहता था, पर उसे समझ में देर से आया कि आज की दुनिया “पत्थर” जैसी कठोरता, मजबूती और स्वार्थ पर टिकी है।
मिट्टी से बना घर प्रतीक है सच्चे रिश्तों का निस्वार्थ प्रेम का भरोसे और समर्पण का इंसानियत की गर्माहट का हम सब अपने जीवन की नींव इन्हीं मिट्टी जैसे मुलायम एहसासों पर रखते हैं। हमें लगता है कि अगर हम सच्चे रहेंगे, तो दुनिया भी सच्ची होगी। अगर हम ईमानदार रहेंगे, तो सामने वाला भी ईमानदार होगा। अगर हम निस्वार्थ प्रेम देंगे, तो वही लौटकर मिलेगा। लेकिन जि़ंदगी अक्सर हमारे इन विश्वासों को तोड़ देती है।
पत्थर से बने घर मजबूत होते हैं तूफानों में भी खड़े रहते हैं। यही आज की दुनिया की सच्चाई है। आज भावनाएँ नहीं, बल्कि मजबूती काम आती है। आज रिश्तों से ज़्यादा ज़रूरी है सुरक्षा, फायदे का सौदा, और स्वार्थ की नींव। लोग अब यह नहीं देखते कि सामने वाला कितना सच्चा है, बल्कि यह देखते हैं कि उससे उन्हें क्या लाभ मिल सकता है। आज दिल से नहीं, दिमाग से फैसले लिए जाते हैं। यही कारण है कि पत्थर के बने रिश्ते ज़्यादा लंबे चलते हैं, जबकि मिट्टी से बने रिश्ते पहली बरसात में ही ढह जाते हैं।
मिट्टी कमजोर नहीं होती, वह जीवन देती है। उससे अन्न उगता है, उससे मकान बनते हैं, उससे सभ्यताएँ जन्म लेती हैं। समस्या मिट्टी में नहीं, बल्कि हमारी सोच में है। हमने मिट्टी को भावनाओं की तरह समझ लिया—कमज़ोर। जबकि सच्चाई यह है कि मिट्टी में भी अपार ताकत होती है, बस उसे सही आकार और सहारा चाहिए।
अगर मिट्टी में थोड़ा पत्थर मिल जाए, तो वह भी मजबूत ईंट बन सकती है। ठीक वैसे ही अगर भावनाओं के साथ थोड़ी समझदारी जोड़ दी जाए, तो इंसान टूटने से बच सकता है।
कितने ही लोग हैं जो पूरे मन से रिश्ते निभाते हैं, पूरी सच्चाई से दोस्ती करते हैं, पूरे विश्वास से प्रेम करते हैं—और अंत में सबसे ज़्यादा वही टूटते हैं। क्योंकि उन्होंने अपने रिश्तों की दीवारें केवल “मिट्टी” से बनाई थीं—भावनाओं से—बिना दुनिया की आँधी और बारिश को समझे।
जब धोखा मिलता है, तो इंसान खुद को दोष देता है। वह सोचता है— काश थोड़ा स्वार्थी होता, काश थोड़ा कठोर होता, काश पत्थर जैसा मजबूत बना होता, यह सबसे बड़ा सवाल है। क्या इस कठोर दुनिया में जीने के लिए हमें भी पत्थर बन जाना चाहिए? क्या भावनाएँ छोड़ देना ही सही रास्ता है?
नहीं। अगर पूरी दुनिया पत्थर बन गई, तो फिर इंसान और मशीन में क्या फर्क रह जाएगा? इंसान की पहचान उसकी संवेदनाएँ हैं, उसका हृदय है, उसका करुण भाव है। लेकिन अब ज़रूरत है भावनाओं के साथ विवेक की, प्रेम के साथ सतर्कता की और विश्वास के साथ समझदारी की।
जीवन केवल मिट्टी से भी नहीं चलता और केवल पत्थर से भी नहीं। जीवन चलता है इन दोनों के संतुलन से। जहां भावनाएँ हों, वहां समझदारी भी हो, जहां प्रेम हो, वहां आत्मसम्मान भी हो, जहां विश्वास हो, वहां सावधानी भी हो। जो व्यक्ति केवल मिट्टी बनकर जीता है, वह जल्दी टूट जाता है। और जो केवल पत्थर बन जाता है, वह अंदर से सूख जाता है।
हम तो मिट्टी से घर बनाने में लगे थे, यह पंक्ति हर उस इंसान की कहानी है जिसने सच्चाई, प्रेम और भरोसे से अपने जीवन और रिश्ते बनाए—और बदले में ठोकरें पाईं। यह पंक्ति हमें सिखाती है कि दुनिया जैसी है, उसे समझकर ही कदम बढ़ाना चाहिए।
मिट्टी बने रहिए—लेकिन थोड़े से पत्थर की मजबूती के साथ। क्योंकि सिर्फ नर्म होना काफी नहीं, ज़रूरत के समय मजबूत होना भी जरूरी है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here