
डॉ विजय गर्ग
धरती पर जीवन की विविधता ही प्रकृति की सबसे बड़ी शक्ति है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, सूक्ष्मजीव और मनुष्य—ये सभी मिलकर एक संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करते हैं। इसी विविधता को जैव विविधता कहा जाता है। आज विकास की दौड़ में मानव ने प्रकृति के संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया है, जिससे जैव विविधता को गंभीर खतरा पैदा हो गया है। ऐसे समय में यह आवश्यक हो गया है कि विकास का मार्ग टिकाऊ विकास के सिद्धांतों पर आधारित हो, जिसमें प्रकृति और मानव दोनों का संतुलित हित सुरक्षित रहे।
जैव विविधता केवल पर्यावरण की सुंदरता ही नहीं बढ़ाती, बल्कि मानव जीवन के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। हमारी खाद्य श्रृंखला, औषधियाँ, कृषि, जल चक्र और जलवायु संतुलन—सब कुछ जैव विविधता पर निर्भर करता है। जंगलों में पाए जाने वाले अनेक पौधों से जीवन रक्षक दवाएँ बनती हैं। विविध फसलें और जीव-जंतु कृषि व्यवस्था को मजबूत बनाते हैं। यदि जैव विविधता घटती है तो पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर पड़ जाता है और अंततः इसका प्रभाव मानव जीवन पर भी पड़ता है।
आज विश्व के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना। बड़े-बड़े उद्योग, शहरीकरण, वनों की कटाई, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण अनेक प्रजातियाँ विलुप्त होने की कगार पर पहुँच गई हैं। विकास के नाम पर यदि प्रकृति को नुकसान पहुँचाया जाएगा तो इसका परिणाम भविष्य में गंभीर पर्यावरणीय संकट के रूप में सामने आएगा।
टिकाऊ विकास का अर्थ है—ऐसा विकास जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करे, लेकिन भविष्य की पीढ़ियों की जरूरतों से समझौता न करे। इसके लिए प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है। वनों का संरक्षण, जल स्रोतों की रक्षा, जैविक खेती को बढ़ावा, नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग और प्रदूषण को नियंत्रित करना टिकाऊ विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
जैव विविधता के संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है। ग्रामीण और आदिवासी समाज सदियों से प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन जीते आए हैं। उनके पारंपरिक ज्ञान और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति सम्मान की भावना से हमें बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है। यदि विकास की योजनाओं में स्थानीय समुदायों को शामिल किया जाए तो संरक्षण के प्रयास अधिक प्रभावी हो सकते हैं।
इसके साथ ही सरकारों, वैज्ञानिकों और समाज के सभी वर्गों को मिलकर कार्य करना होगा। शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से लोगों को यह समझाना जरूरी है कि जैव विविधता केवल पर्यावरण की नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व की भी सुरक्षा करती है। स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा को मजबूत बनाना भी समय की आवश्यकता है।
अंततः कहा जा सकता है कि जैव विविधता और टिकाऊ विकास एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि हम प्रकृति की विविधता को बचाते हैं, तो विकास की राह भी सुरक्षित और स्थायी बनती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम विकास की नई सोच अपनाएँ—ऐसी सोच जो प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, बल्कि सहअस्तित्व का मार्ग दिखाए। तभी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ और समृद्ध पृथ्वी सुनिश्चित की जा सकती है।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब


