मनुष्य के अंदर छुपा दि
व्य ज्ञान
शरद कटियार
आज के दौर में प्रशंसा एक ऐसी चीज बन गई है जिसका प्रयोग अक्सर स्वार्थ सिद्धि के लिए किया जाता है। बहुत बार हम देखते हैं कि लोग सामने से हमारी तारीफ करते हैं, हमारे गुणों का बखान करते हैं, लेकिन उनके भीतर छिपा उद्देश्य केवल अपना लाभ होता है। ऐसी प्रशंसा धीरे-धीरे मनुष्य को भ्रम में डाल देती है और वह अपने वास्तविक स्वरूप से दूर होता चला जाता है।
वास्तव में प्रशंसा दो प्रकार की होती है—एक स्वार्थ से भरी हुई और दूसरी ज्ञान से उत्पन्न। स्वार्थ से भरी प्रशंसा व्यक्ति को अहंकार की ओर ले जाती है, जबकि ज्ञान से उत्पन्न प्रशंसा व्यक्ति को आत्मबोध और विकास की ओर प्रेरित करती है।
स्वार्थ से भरी प्रशंसा का भ्रम
समाज में बहुत से लोग ऐसे मिलते हैं जो सामने वाले की प्रशंसा केवल इसलिए करते हैं ताकि उससे लाभ प्राप्त कर सकें। यह प्रशंसा बाहरी होती है, इसमें सत्य की गहराई नहीं होती। ऐसे लोग शब्दों से मिठास घोलते हैं, लेकिन उनके भीतर का उद्देश्य केवल अवसर प्राप्त करना होता है।
जब मनुष्य ऐसी प्रशंसा से प्रभावित होता है तो उसके भीतर अहंकार का जन्म होने लगता है। वह स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है और धीरे-धीरे उसका विवेक कमजोर पड़ने लगता है। यही कारण है कि आध्यात्मिक दृष्टि से कहा गया है कि अत्यधिक प्रशंसा भी मनुष्य के पतन का कारण बन सकती है।
ज्ञानी की प्रशंसा क्यों होती है विशेष
इसके विपरीत जब कोई ज्ञानी व्यक्ति किसी की प्रशंसा करता है तो वह केवल शब्दों की सजावट नहीं होती, बल्कि उसमें सत्य और कल्याण की भावना छिपी होती है। ज्ञानी व्यक्ति का मन स्वार्थ से मुक्त होता है। वह किसी का गुण इसलिए नहीं बताता कि उससे उसे कोई लाभ मिलेगा, बल्कि इसलिए कि उस व्यक्ति के भीतर मौजूद अच्छाई और बढ़े।
ज्ञानी की दृष्टि सामान्य मनुष्य की दृष्टि से अलग होती है। वह बाहरी रूप नहीं, बल्कि भीतर के संस्कार और आचरण को देखता है। इसलिए उसकी प्रशंसा व्यक्ति के अहंकार को नहीं बढ़ाती, बल्कि उसके आत्मविश्वास और सद्गुणों को मजबूत करती है।
आध्यात्मिक दर्शन का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है कि भगवान किसी दूर स्थान पर नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर ही निवास करते हैं। हर मनुष्य के अंदर दिव्यता का एक बीज होता है। जब व्यक्ति अपने विचारों को शुद्ध करता है, अपने आचरण को अच्छा बनाता है और दूसरों के कल्याण की भावना रखता है, तब यह दिव्य बीज अंकुरित होने लगता है।
ऐसा व्यक्ति धीरे-धीरे ईश्वर के गुणों को धारण करने लगता है—करुणा, सत्य, प्रेम और निस्वार्थ सेवा। यही गुण उसे सामान्य मनुष्य से अलग बनाते हैं।
जब किसी ऐसे व्यक्ति के मुख से प्रशंसा निकलती है जो आत्मज्ञान से संपन्न है, तो वह प्रशंसा केवल शब्द नहीं होती बल्कि एक प्रेरणा होती है। वह सामने वाले को यह संकेत देती है कि वह सही मार्ग पर है और उसे अपने सद्गुणों को और विकसित करना चाहिए।
इस प्रकार की प्रशंसा व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाती है और उसे समाज के लिए उपयोगी बनने की दिशा में प्रेरित करती है।
इसलिए जीवन में यह समझना आवश्यक है कि हर प्रशंसा सच्ची नहीं होती। अधिकांश प्रशंसा केवल स्वार्थ का मुखौटा होती है। लेकिन जब कोई ज्ञानी, निष्काम और सदाचारी व्यक्ति आपकी सराहना करता है, तो वह वास्तव में आपके भीतर मौजूद अच्छाई को पहचान कर उसे आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा होता है।
सच्चा मनुष्य वही है जो प्रशंसा से मदहोश न हो और आलोचना से निराश न हो। वह अपने आचरण, अपने विचार और अपने कर्मों को इतना श्रेष्ठ बनाता है कि उसके भीतर का दिव्य तत्व स्वयं प्रकट होने लगता है।
और जब मनुष्य के भीतर यह दिव्यता जागृत होती है, तब उसकी प्रशंसा करने वाला कोई भी व्यक्ति वास्तव में उसी दिव्य प्रकाश को प्रणाम कर रहा होता है।


