
शरद कटियार
भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है। देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है और करीब 27–28 प्रतिशत आबादी 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग में आती है। यह स्थिति किसी भी देश के लिए बड़ी ताकत मानी जाती है, क्योंकि युवा ही विकास की असली ऊर्जा होते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि आज यही युवा वर्ग बढ़ती बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहा है।
पिछले दो दशकों में भारत में शिक्षा का स्तर तेजी से बढ़ा है। उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। अनुमान के अनुसार देश में लगभग 9–10 करोड़ युवा स्नातक या उससे अधिक शिक्षित हैं।
इसके बावजूद सबसे चिंताजनक बात यह है कि शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी दर सामान्य बेरोजगारी दर से कहीं अधिक है। विभिन्न श्रम सर्वेक्षणों के अनुसार भारत में युवाओं की बेरोजगारी दर लगभग 13 से 14 प्रतिशत के बीच बताई जाती है, जबकि स्नातक युवाओं में यह दर कई जगह 20 प्रतिशत से अधिक तक पहुंच जाती है।
इसका अर्थ यह है कि लाखों पढ़े-लिखे युवा डिग्री लेकर भी रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं।
भारत में सरकारी नौकरी के लिए युवाओं का आकर्षण बहुत अधिक है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि किसी भी सरकारी भर्ती में कुछ हजार पदों के लिए लाखों आवेदन आ जाते हैं।
रेलवे, पुलिस, शिक्षक भर्ती या अन्य सरकारी नौकरियों में अक्सर यह देखने को मिलता है कि 10 हजार पदों के लिए 1 से 2 करोड़ तक आवेदन आ जाते हैं। इससे साफ है कि युवाओं में रोजगार की भारी मांग है, लेकिन अवसर सीमित हैं।
यही कारण है कि देशभर में कोचिंग संस्थानों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ी है।
रोजगार और बेहतर अवसरों की तलाश में बड़ी संख्या में भारतीय युवा विदेशों का रुख कर रहे हैं। हाल के वर्षों में यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2024 में लगभग 13 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेशों में पढ़ाई कर रहे थे। इनमें सबसे अधिक छात्र अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में पढ़ाई के लिए गए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि विदेश जाने वाले कई छात्र पढ़ाई पूरी करने के बाद वहीं नौकरी कर लेते हैं, जिससे भारत को ब्रेन ड्रेन की समस्या का भी सामना करना पड़ता है।
बेरोजगारी के प्रमुख कारण
विशेषज्ञों के अनुसार भारत में बेरोजगारी बढ़ने के पीछे कई कारण हैं,शिक्षा और उद्योग की जरूरतों के बीच अंतर,तकनीकी बदलाव और ऑटोमेशन,
सरकारी नौकरियों की सीमित संख्या,निजी क्षेत्र में धीमी रोजगार वृद्धि,कौशल प्रशिक्षण की कमी।
कई रिपोर्टों के अनुसार भारत में केवल लगभग 50 प्रतिशत युवा ही पूरी तरह “एम्प्लॉयबल” यानी उद्योगों की जरूरतों के अनुसार तैयार माने जाते हैं।
बेरोजगारी अब केवल आर्थिक समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा बन चुकी है। चुनावों के दौरान भी युवाओं को रोजगार देने के वादे प्रमुख मुद्दों में शामिल रहते हैं।
देश के कई राज्यों में युवाओं द्वारा नौकरी की मांग को लेकर प्रदर्शन और आंदोलन भी देखने को मिले हैं। इससे साफ है कि युवा वर्ग रोजगार को लेकर बेहद संवेदनशील है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि भारत को अपनी युवा शक्ति का सही उपयोग करना है तो रोजगार सृजन पर विशेष ध्यान देना होगा। इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम जरूरी हैं जैसे उद्योग और स्टार्टअप को बढ़ावा देना,कौशल विकास कार्यक्रमों को मजबूत करना,
तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देना
छोटे और मध्यम उद्योगों को प्रोत्साहन देना प्रमुख होना चाहिए।
यदि इन क्षेत्रों में गंभीर प्रयास किए जाएं तो भारत की विशाल युवा आबादी देश की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बन सकती है।
भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है। यह देश के लिए एक बड़ा अवसर भी है और एक चुनौती भी। यदि युवाओं को शिक्षा के साथ रोजगार के पर्याप्त अवसर मिलते हैं तो भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़ी शक्ति बन सकता है।
लेकिन यदि बेरोजगारी की समस्या का समाधान नहीं हुआ तो यही युवा असंतोष और निराशा का कारण भी बन सकते हैं। इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि भारत अपने युवाओं को रोजगार और अवसर कब और कैसे उपलब्ध कराएगा।


