(पवन वर्मा -विभूति फीचर्स)
मध्यप्रदेश की पहचान लंबे समय से कृषि प्रधान राज्य के रूप में रही है। प्रदेश की अर्थव्यवस्था, ग्रामीण जीवन और सामाजिक संरचना का बड़ा हिस्सा खेती-किसानी से जुड़ा है। यही कारण है कि जब भी कृषि से जुड़ा कोई महत्वपूर्ण निर्णय लिया जाता है,तो उसका प्रभाव केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि गांवों की अर्थव्यवस्था, बाजार और सामाजिक जीवन तक व्यापक रूप से दिखाई देता है। ऐसे समय में जब खेती की लागत लगातार बढ़ रही है और किसान अपनी उपज के उचित मूल्य की अपेक्षा करते हैं, तब राज्य सरकार द्वारा गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बोनस देने का निर्णय किसानों के भरोसे को मजबूत करने वाला कदम माना जाना चाहिए।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने वर्ष 2026-27 के लिए गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर 40 रुपये प्रति क्विंटल बोनस देने की घोषणा की है। इस निर्णय के बाद किसानों को गेहूं का भुगतान 2625 रुपये प्रति क्विंटल की दर से प्राप्त होगा। पहली नजर में यह राशि बहुत बड़ी नहीं लग सकती, लेकिन खेती की आर्थिक संरचना को समझने वाले जानते हैं कि समर्थन मूल्य के साथ दिया गया यह बोनस किसानों की आय में महत्वपूर्ण योगदान देता है। यह केवल अतिरिक्त धनराशि नहीं है, बल्कि यह एक संदेश भी है कि सरकार किसानों की मेहनत और लागत को समझते हुए उनके हितों को प्राथमिकता दे रही है।
कृषि क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौती लागत और आय के बीच संतुलन की होती है। पिछले कुछ वर्षों में बीज, उर्वरक, कीटनाशक, डीजल और मजदूरी की लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। सिंचाई व्यवस्था भी कई स्थानों पर महंगी होती जा रही है। ऐसे में यदि किसान को अपनी फसल का उचित मूल्य नहीं मिलता, तो खेती धीरे-धीरे घाटे का सौदा बन जाती है। यही कारण है कि समर्थन मूल्य और बोनस की व्यवस्था किसानों के लिए सुरक्षा कवच की तरह काम करती है।
मध्यप्रदेश में गेहूं उत्पादन लगातार बढ़ रहा है। प्रदेश के किसान आधुनिक तकनीक, उन्नत बीज और बेहतर सिंचाई प्रबंधन के माध्यम से उत्पादन क्षमता को बढ़ा रहे हैं। कई जिलों में प्रति हेक्टेयर उत्पादन राष्ट्रीय औसत से भी अधिक हो चुका है। इस स्थिति में यदि किसानों को बेहतर मूल्य मिलता है, तो वे और अधिक उत्साह के साथ उत्पादन बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ते हैं। इससे राज्य की कृषि व्यवस्था को भी मजबूती मिलती है।
राज्य सरकार ने केवल वर्तमान वर्ष के लिए बोनस देने तक ही अपनी सोच सीमित नहीं रखी है, बल्कि भविष्य की स्पष्ट दिशा भी तय की है। सरकार ने अपने संकल्प-पत्र में वर्ष 2028 तक गेहूं की खरीद 2700 रुपये प्रति क्विंटल की दर से करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। यह लक्ष्य केवल एक आर्थिक घोषणा नहीं है, बल्कि किसानों को भविष्य के प्रति आश्वस्त करने वाला संकेत भी है। यदि यह लक्ष्य निर्धारित समय में प्राप्त होता है, तो मध्यप्रदेश के गेहूं उत्पादक किसानों को देश में सबसे बेहतर मूल्य मिलने की स्थिति बन सकती है।
दरअसल कृषि क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण तत्व भरोसा होता है। किसान जब बीज बोता है, तो उसके मन में यह विश्वास होना चाहिए कि उसकी मेहनत का उचित मूल्य मिलेगा। यदि उसे बाजार या नीति व्यवस्था पर भरोसा नहीं होता, तो वह खेती में निवेश करने से हिचकता है। ऐसे में सरकार की ओर से स्पष्ट लक्ष्य और ठोस निर्णय किसानों के मन में विश्वास पैदा करते हैं।
इस निर्णय का एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि यह किसानों को स्थिर नीति का संकेत देता है। अक्सर देखा गया है कि कृषि से जुड़े निर्णय तात्कालिक परिस्थितियों के अनुसार लिए जाते हैं, जिससे किसानों को भविष्य की योजना बनाने में कठिनाई होती है। लेकिन जब सरकार यह स्पष्ट करती है कि आने वाले तीन वर्षों में समर्थन मूल्य को 2700 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा, तो किसान अपनी खेती की रणनीति उसी आधार पर तय कर सकते हैं।
मुख्यमंत्री द्वारा गेहूं उपार्जन के लिए पंजीयन की अंतिम तिथि बढ़ाकर 10 मार्च करना भी किसानों की व्यवहारिक समस्याओं को समझने वाला निर्णय है। कई बार तकनीकी कारणों, नेटवर्क समस्या या स्थानीय प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण किसान समय पर पंजीयन नहीं करा पाते। ऐसी स्थिति में समय सीमा बढ़ाने से हजारों किसानों को राहत मिलती है और वे अपनी उपज को समर्थन मूल्य पर बेचने के अवसर से वंचित नहीं होते।
सिंचाई के लिए दिन में बिजली उपलब्ध कराने का निर्णय भी उतना ही महत्वपूर्ण है। ग्रामीण क्षेत्रों में लंबे समय से यह समस्या रही है कि किसानों को सिंचाई के लिए रात के समय बिजली मिलती है। इससे किसानों को देर रात खेतों में जाना पड़ता है, जो कई बार जोखिम भरा भी होता है। दुर्घटनाओं और वन्यजीवों के खतरे जैसी समस्याएं भी सामने आती रही हैं। दिन में बिजली उपलब्ध होने से किसान अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक तरीके से सिंचाई कर सकेंगे।
राज्य सरकार द्वारा उड़द की खरीदी पर 600 रुपये प्रति क्विंटल बोनस देने की घोषणा भी कृषि विविधीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। लंबे समय से देश में दलहन उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। यदि किसानों को दलहन फसलों पर बेहतर प्रोत्साहन मिलता है, तो वे गेहूं और धान के साथ-साथ दलहन की खेती को भी अपनाने के लिए प्रेरित होते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता भी बनी रहती है और किसानों को अतिरिक्त आय के अवसर भी मिलते हैं।
कृषि नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उसमें किसानों की भागीदारी सुनिश्चित हो। मुख्यमंत्री द्वारा भारतीय किसान संघ के प्रतिनिधियों के साथ बैठक कर उनके सुझावों पर चर्चा करना इस दिशा में सकारात्मक पहल मानी जा सकती है। भूमि अधिग्रहण पर मुआवजा, जंगली जानवरों से फसल नुकसान, मंडी व्यवस्था, गिरदावरी, नामांतरण और सीमांकन जैसे मुद्दे सीधे तौर पर किसानों के जीवन से जुड़े हैं। इन विषयों पर संवाद और समाधान की दिशा में प्रयास यह दर्शाते हैं कि सरकार किसानों की समस्याओं को केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं, बल्कि व्यापक प्रशासनिक परिप्रेक्ष्य में भी देख रही है।
मध्यप्रदेश को देश के “फूड बास्केट” के रूप में स्थापित करने में किसानों की मेहनत और सरकार की नीतियों दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। गेहूं, सोयाबीन, दालें और तिलहन उत्पादन में प्रदेश ने लगातार अपनी स्थिति मजबूत की है। यदि इसी प्रकार किसानों को प्रोत्साहन मिलता रहा और कृषि ढांचे को मजबूत किया जाता रहा, तो आने वाले वर्षों में मध्यप्रदेश कृषि क्षेत्र में और भी बड़ी भूमिका निभा सकता है।
कृषि केवल उत्पादन का विषय नहीं है, बल्कि यह सामाजिक स्थिरता और ग्रामीण समृद्धि का आधार भी है। जब किसान समृद्ध होता है, तो गांवों में रोजगार बढ़ता है, बाजार सक्रिय होते हैं और स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। इसलिए किसानों के हित में लिया गया हर निर्णय व्यापक आर्थिक प्रभाव भी उत्पन्न करता है।
इस दृष्टि से देखा जाए तो गेहूं पर बोनस, भविष्य में 2700 रुपये प्रति क्विंटल तक समर्थन मूल्य का लक्ष्य, पंजीयन अवधि बढ़ाना और सिंचाई के लिए दिन में बिजली उपलब्ध कराना जैसे निर्णय किसानों के विश्वास को मजबूत करने वाले कदम हैं। यदि इन निर्णयों को प्रभावी ढंग से लागू किया गया और कृषि से जुड़े अन्य ढांचागत सुधार भी इसी गति से आगे बढ़े, तो मध्यप्रदेश के किसानों के लिए यह एक नए विश्वास और नई संभावनाओं का दौर साबित हो सकता है।
अंततः कृषि नीति की सफलता केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन से तय होती है। यदि समर्थन मूल्य पर खरीदी की व्यवस्था सुचारु रूप से संचालित होती है, किसानों को समय पर भुगतान मिलता है और बिजली व सिंचाई जैसी सुविधाएं वास्तव में उपलब्ध होती हैं, तो यह निर्णय प्रदेश के कृषि इतिहास में महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है।
मध्यप्रदेश के किसानों की मेहनत और सरकार की नीतियों के बीच यदि यह संतुलन बना रहा, तो प्रदेश की कृषि व्यवस्था न केवल मजबूत होगी, बल्कि किसानों के जीवन में समृद्धि का नया अध्याय भी बनेगा। (विभूति फीचर्स)


