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Tuesday, March 3, 2026

पिता की आज्ञा: अनुभव, विश्वास और जीवन का सबसे बड़ा निर्णय

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— जी.सी. कटियार
होली के रंगों की तरह जीवन भी कई अनुभवों से रंगा होता है। कुछ निर्णय ऐसे होते हैं, जिनका अर्थ हमें समय बीतने के बाद समझ में आता है। विवाह भी ऐसा ही एक निर्णय है—जहां अक्सर युवा मन अपनी आकांक्षाओं में खोया रहता है, लेकिन माता-पिता की दूरदृष्टि जीवन का रास्ता आसान बना देती है।
मैं उस समय एमएससी प्रथम वर्ष में था, जब मेरी शादी तय कर दी गई। मन में कई सपने थे—पहले डिग्री मिले, फिर नौकरी लगे, उसके बाद विवाह। मुझे लगता था कि नौकरी के बाद आने वाले रिश्तों की बात ही कुछ और होगी। आधुनिक सोच, बड़े घर का रिश्ता—सब कुछ मन में एक अलग तस्वीर बनाता था।
मैंने अपने प्रिय मित्र रमाकान्त जी को साथ लेकर गांव का रुख किया, ताकि पिताजी को समझाया जा सके। रात भर बातचीत चली। मैंने अपने तर्क रखे, लेकिन पिताजी हर बात का जवाब ठोस अनुभव के साथ देते रहे। जो मित्र पहले मेरे पक्ष में थे, वे भी अंततः पिताजी की हां में हां मिलाने लगे। निर्णय मेरे विरुद्ध था। मैंने अंतिम प्रयास किया—“शादी करेंगे, लेकिन अगले वर्ष।” अनुभवी पिताजी मुस्कुराए और दृढ़ स्वर में बोले—“शादी यहीं होगी और इसी साल होगी।” निर्णय अंतिम था।
शादी हो गई। शुरुआती वर्षों में मन में हल्की कसक रही—पत्नी उतनी ‘मॉडर्न’ नहीं थीं, जितनी मैं कल्पना करता था। लेकिन समय सबसे बड़ा शिक्षक होता है। जब साथियों की शादियां हुईं और उनके पारिवारिक हालात सामने आए, तब पिताजी की दूरदृष्टि समझ में आने लगी।
कई मित्र बड़े और आधुनिक घरों में रिश्ते कर लाए थे, लेकिन धीरे-धीरे वे परिवार से दूर होते चले गए। भाइयों-बहनों के लिए उनके घरों में जगह नहीं थी। रिश्तेदारों से दूरी, माता-पिता के लिए संकोच—यह सब देखकर मन विचलित होता था।
वहीं मेरी पत्नी ने शादी के बाद तीन वर्षों तक गांव में रहकर माता-पिता की सेवा की। इस दौरान मैं अपने भाइयों की पढ़ाई और जिम्मेदारियों को ठीक से निभा पाया। घर में सामंजस्य बना रहा। कई बार ऐसी बातें, जो माता-पिता या भाई मुझसे सीधे नहीं कह पाते थे, वे पत्नी से साझा करते और समाधान भी निकल आता। मुझे बाद में जानकारी मिलती, लेकिन घर की शांति बनी रहती।
मैं स्वयं को घोर आलसी और अव्यवस्थित मानता हूं। कई बार सोचता हूं—यदि उस दिन पिताजी की आज्ञा टाल दी होती, तो शायद जीवन की दिशा कुछ और होती। आज यह अनुभव है कि माता-पिता का निर्णय केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन के लंबे अनुभवों का सार होता है।
माता-पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके उस एक निर्णय ने मेरे ‘इहलोक’ और ‘परलोक’ दोनों को संवार दिया। सच ही कहा गया है—माता-पिता बच्चों के लिए भगवान से कम नहीं होते।
आज जब भी किसी मित्र, रिश्तेदार या परिचित के विवाह योग्य बच्चों से मुलाकात होती है, तो बिना मांगे अपना अनुभव साझा कर देता हूं। शायद किसी युवा को समय रहते सही दिशा मिल जाए।
जीवन में आधुनिकता बुरी नहीं, लेकिन संस्कारों और पारिवारिक संतुलन के साथ चलना ही असली समृद्धि है।होली के इस पावन अवसर पर यही संदेश है—रिश्तों के रंग कभी फीके न पड़ें, परिवार का प्रेम सदा बना रहे।
लेखक सेवानिवृत उपकृषि निदेशक हैं।

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