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Monday, March 2, 2026

परंपरा और पर्यावरण का संगम, पर्यावरण विशेषज्ञ गुंजा जैन ने दिया ‘हरित होली’ का मंत्र

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यूथ इंडिया न्यूज़: होली, जो कि भारत के सबसे प्रतिष्ठित और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध त्योहारों में से एक है और पश्चिम में इसे ‘रंगों का त्योहार’ कहा जाता है, भारत और दुनिया भर के समुदायों में पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार कई चीजों का प्रतीक है: प्रेम, नई शुरुआत, वसंत ऋतु का आगमन और हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, बुराई पर अच्छाई की विजय।

स्थानीय लोग नकारात्मकता को दूर करने, पिछले पापों को धोने और पौराणिक राक्षसी होलिका को जलाने के लिए ‘होलिका दहन’ करते हैं। यह प्रेम, नई शुरुआत, वसंत ऋतु के आगमन और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। ज़ेन-ज़ी यानी युवाओं की बदौलत, यह पर्यावरण के प्रति जागरूक उत्सवों की ओर एक महत्वपूर्ण बदलाव का भी प्रतीक बन रहा है।

तो आइए, क्यों न इस बार हम सभी मिलकर ‘हरित होली’ खेलें और सभी को पर्यावरण संरक्षण का संदेश दें। हम सभी आधुनिकता की दौड़ में परंपरागत होली के त्योहार को (सही ढंग से) न मनाकर, इसके होने वाले दुष्परिणामों को बढ़ाने में लगे हुए हैं। पहले के समय में होली फूलों से बने प्राकृतिक रंगों से मनाई जाती थी। भारत में आज भी कई जगहों पर फूलों से होली खेली जाती है, लेकिन इस त्योहार के आधुनिकीकरण और व्यवसायीकरण के कारण कई कंपनियों ने रासायनिक रूप से तैयार किए हुए रंग (डाई) बनाना शुरू कर दिया है, जो बेहद विषैले होते हैं।

ये हमारे स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं, जैसे: अस्थमा, त्वचा संबंधी रोग, जलन, सूजन, एलर्जी और आंखों में संक्रमण आदि। साथ ही, ये हमारे वातावरण को भी प्रभावित करते हैं। ये आसानी से विघटित न होकर प्राकृतिक स्रोतों—वायु, जल और मृदा—को प्रदूषित करते हैं।

इस त्योहार की परंपरागत खूबसूरती को हम अनावश्यक रूप से पानी बहाकर, पानी और रंग से भरे गुब्बारे और प्लास्टिक की थैलियों का उपयोग कर नष्ट कर रहे हैं। यह प्लास्टिक जल निकासी की व्यवस्था को अवरुद्ध करके जल प्रदूषण को बढ़ा देता है। हम प्लास्टिक की बनी पिचकारी का इस्तेमाल कर अगले दिन उसे फेंक देते हैं, जो प्लास्टिक प्रदूषण का कारण बनता है।

होलिका दहन में हम अग्नि प्रज्वलन के लिए पेड़ों को अनावश्यक रूप से काट देते हैं, जिससे वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर का स्तर बढ़ जाता है। इससे न केवल वायु प्रदूषण होता है, बल्कि पर्यावरण का संतुलन भी बिगड़ता है, जिसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हम पर ही प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

अतः आइए हम सभी मिलकर इस बार प्रदूषण मुक्त होली, यानी पर्यावरण मित्र ‘हरित होली’ मनाने का प्रण लें तथा युवाओं को भी यही संदेश दें। यदि हम अभी भी इन त्योहारों के महत्व को नहीं समझे और अनावश्यक रूप से अपने पर्यावरण को नुकसान पहुँचाते रहे, तो भविष्य में इसके बहुत घातक परिणाम होंगे।

इको-फ्रेंडली त्योहार के लिए हम ये कदम उठा सकते हैं:

• प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल करें (जैसे: फूलों से बने रंग, हर्बल सूखे गुलाल, मुल्तानी मिट्टी, हल्दी आदि)।
• पानी को कम से कम बर्बाद करें।
• होलिका दहन में पेड़ों की लकड़ी के बजाय गोबर से बने उपलों का उपयोग करें।
• नए कपड़ों की जगह पुराने कपड़ों का ही इस्तेमाल करें।
• प्लास्टिक की थैली और गुब्बारों का प्रयोग न करें और दूसरों को भी मना करें।
• होली पर जब अपने परिवार के लोगों से मिलने जाएं, तो साथ में एक पेड़ जरूर लगाएं और अपनी हरित होली को यादगार बनाएं।

ये छोटे-छोटे संकल्प लेकर ही हम अपने त्योहारों की गरिमा बनाए रख सकते हैं और अपनी आने वाली पीढ़ियों को पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे सकते हैं।

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