होली उमंग और उत्साह का पर्व है, लेकिन किसी भी उत्सव की सार्थकता तभी है जब उसमें सभी लोग सुरक्षित और सम्मानित महसूस करें। दुर्भाग्य से कई बार “बुरा न मानो होली है” जैसी पंक्तियों की आड़ में अनुचित व्यवहार को हल्के में लेने की कोशिश की जाती है। यह प्रवृत्ति न केवल सामाजिक मर्यादा के खिलाफ है, बल्कि त्योहार की मूल भावना के भी विपरीत है।
आज की युवा पीढ़ी इस सोच को बदलने के लिए आगे आ रही है। कई कॉलेजों और सामाजिक संगठनों द्वारा “सेफ होली” अभियान चलाए जा रहे हैं, जिनका उद्देश्य स्पष्ट है—होली आनंद का पर्व है, असुरक्षा का नहीं।
जिम्मेदार युवा समझते हैं कि किसी की इच्छा के विरुद्ध रंग लगाना, अशोभनीय टिप्पणी करना या भीड़ का फायदा उठाकर गलत व्यवहार करना अपराध है, मजाक नहीं। सहमति (कंसेंट) का सम्मान करना आधुनिक और संवेदनशील समाज की पहचान है।
महिलाओं की सुरक्षित होली सुनिश्चित करने के लिए युवाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।
मित्र समूहों में सजगता और सहयोग बनाए रखना।
सार्वजनिक स्थानों पर अनुशासन और संयम का पालन करना।
किसी भी अनुचित व्यवहार का विरोध करना और जरूरत पड़ने पर सहायता प्रदान करना।
सोशल मीडिया के माध्यम से भी युवा जागरूकता फैला रहे हैं। “नो मींस नो”, “प्ले विद कंसेंट” और “रिस्पेक्टफुल होली” जैसे संदेश इस बात का संकेत हैं कि नई पीढ़ी त्योहार को जिम्मेदारी के साथ मनाना चाहती है।
सच्ची होली वही है जिसमें हंसी हो, उल्लास हो, लेकिन साथ ही सम्मान और सुरक्षा भी हो। जब महिलाएं निर्भय होकर रंगों का आनंद ले सकें, तभी यह पर्व अपनी पूर्णता प्राप्त करता है।
नई सोच यही कहती है—होली का रंग तभी गहरा है, जब उसमें समानता और सम्मान की चमक हो।जिम्मेदार युवा ही इस बदलाव की असली ताकत हैं।
महिलाओं की सुरक्षित होली: जिम्मेदार युवा


