होली भारतीय समाज का ऐसा उत्सव है, जो स्वाभाविक रूप से भेद मिटाने का संदेश देता है। रंग जब चेहरे पर लगते हैं तो वे न जाति पूछते हैं, न धर्म, न भाषा और न ही सामाजिक स्थिति। वे केवल एक बात कहते हैं—हम सब एक हैं।
आज जब देश और समाज में विभाजन की चर्चाएं अक्सर सुर्खियों में रहती हैं, तब युवा पीढ़ी इस त्योहार के माध्यम से एकता की नई मिसाल पेश कर रही है। कई कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और गांवों में “यूनिटी होली” जैसे आयोजन किए जा रहे हैं, जहां सभी वर्गों और समुदायों के लोग मिलकर रंगों का उत्सव मनाते हैं।
यह पहल केवल प्रतीकात्मक नहीं है। यह एक सामाजिक संदेश है कि नई पीढ़ी विभाजन की राजनीति से ऊपर उठकर समरसता की राह चुन रही है। युवा समझते हैं कि त्योहार का वास्तविक अर्थ मेल-मिलाप और संवाद है, न कि दूरी और भेदभाव।
कॉलेज परिसरों में अक्सर ऐसे दृश्य देखने को मिलते हैं जहां अलग-अलग राज्यों, भाषाओं और पृष्ठभूमियों से आए छात्र एक साथ रंग खेलते हैं। गांवों में भी सामूहिक होली का आयोजन सामाजिक बंधनों को मजबूत करता है। इन आयोजनों में संगीत, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामूहिक भोजन जैसे तत्व सामाजिक दूरी को पाटने का काम करते हैं।
युवा पीढ़ी का यह दृष्टिकोण बताता है कि वे केवल परंपरा निभाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उसे सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी बना रहे हैं। जब वे कहते हैं कि “रंग जाति और धर्म नहीं पूछते,” तो यह केवल नारा नहीं, बल्कि व्यवहार में दिखने वाली सच्चाई है।
आज की होली इस बात का प्रमाण बन रही है कि नई सोच विभाजन नहीं, संवाद को बढ़ावा देती है। एकता की यह होली केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने का सतत प्रयास है।
यदि यह प्रवृत्ति निरंतर बनी रही, तो आने वाले समय में होली केवल रंगों का पर्व नहीं रहेगी—वह सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता का सशक्त प्रतीक बन जाएगी।
रंगों की राजनीति से दूर: एकता की होली


