भरत चतुर्वेदी
भारत विविधताओं का देश है। यहां भाषा, धर्म, संस्कृति और परंपराओं की बहुलता ही इसकी सबसे बड़ी शक्ति मानी जाती रही है। लेकिन जब यही विविधता विभाजन का कारण बनने लगे, जब जाति के नाम पर समाज में दरारें गहरी होने लगें और जब युवा पीढ़ी नफरत के नारों में उलझने लगे—तब यह केवल सामाजिक समस्या नहीं रह जाती, बल्कि राष्ट्र के भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी बन जाती है।
जातिवाद कोई नया विषय नहीं है। सदियों से सामाजिक संरचनाओं में इसकी जड़ें रही हैं। संविधान ने समानता, न्याय और अवसर की गारंटी देकर इस व्यवस्था को चुनौती दी। शिक्षा, आरक्षण और सामाजिक सुधार आंदोलनों ने कई सकारात्मक बदलाव भी लाए। लेकिन डिजिटल युग में जातिवाद का एक नया चेहरा उभर रहा है—सोशल मीडिया की बहसों, ट्रोलिंग और उकसावे के रूप में।
आज का युवा, जो ऊर्जा, नवाचार और परिवर्तन का प्रतीक होना चाहिए, कई बार जातीय पहचान के आधार पर समूहों में बंटता दिखाई देता है। कॉलेज कैंपस से लेकर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक, जातिगत टिप्पणियां और नफरत भरे संदेश माहौल को विषैला बना रहे हैं। यह प्रवृत्ति केवल सामाजिक ताने-बाने को कमजोर नहीं करती, बल्कि युवाओं की सोच को भी सीमित कर देती है।
सबसे बड़ा खतरा यह है कि जातिवाद योग्यता और प्रतिभा को पीछे धकेल देता है। जब पहचान का आधार कर्म और क्षमता के बजाय जाति बन जाए, तो प्रतिस्पर्धा स्वस्थ नहीं रह जाती। इससे समाज में अविश्वास और असंतोष बढ़ता है। युवा अपनी ऊर्जा विकास और नवाचार में लगाने के बजाय आपसी संघर्ष में खर्च करने लगते हैं।
राजनीतिक और सामाजिक शक्तियां भी कई बार इस विभाजन का लाभ उठाती हैं। चुनावी गणित, भीड़ की राजनीति और भावनात्मक उकसावे के जरिए युवाओं को जाति के नाम पर संगठित किया जाता है। यह अल्पकालिक लाभ भले दे दे, लेकिन दीर्घकाल में राष्ट्र की एकता को कमजोर करता है।
आर्थिक दृष्टि से भी इसका प्रभाव गंभीर है। स्टार्टअप, तकनीक और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के इस दौर में देश को एकजुट और सहयोगी युवा शक्ति की आवश्यकता है। यदि युवा आपसी भेदभाव में उलझे रहेंगे, तो विकास की गति प्रभावित होगी।
समाधान क्या है? सबसे पहले शिक्षा को केवल डिग्री तक सीमित न रखकर संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक समरसता से जोड़ना होगा। स्कूल और कॉलेजों में संवाद, बहस और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से समानता की भावना को मजबूत किया जा सकता है।
दूसरा, सोशल मीडिया पर जिम्मेदार व्यवहार की आवश्यकता है। नफरत फैलाने वाली भाषा को अस्वीकार करना और सकारात्मक संवाद को बढ़ावा देना युवाओं की नैतिक जिम्मेदारी है।
तीसरा, नेतृत्व की भूमिका महत्वपूर्ण है। समाज और राजनीति के जिम्मेदार व्यक्तियों को विभाजनकारी बयानबाजी से बचना चाहिए और एकता का संदेश देना चाहिए।
भारत का भविष्य युवा पीढ़ी के हाथों में है। यदि वही पीढ़ी जातिवाद और नफरत के जाल में फंस जाएगी, तो राष्ट्र की प्रगति बाधित होगी। लेकिन यदि वही युवा समानता, सहयोग और सम्मान का मार्ग चुनेंगे, तो विविधता हमारी सबसे बड़ी ताकत बनी रहेगी।
राष्ट्र निर्माण केवल सड़कों और इमारतों से नहीं होता; यह विचारों और मूल्यों से होता है। जातिवाद का जहर जितना जल्दी समाप्त होगा, उतनी ही जल्दी एक सशक्त, समरस और प्रगतिशील भारत की नींव मजबूत होगी।
जातिवाद का जहर और युवा पीढ़ी में बढ़ती नफरत: राष्ट्र के भविष्य के लिए खतरे की घंटी


