33.2 C
Lucknow
Saturday, February 28, 2026

बयान, बहस और समाज: 90 बनाम 10 की राजनीति में संवाद की जरूरत

Must read

उपकार मणि
हाल के दिनों में 90 बनाम 10 जैसे आंकड़ों को लेकर दिए गए एक राजनीतिक बयान ने सामाजिक और जातीय बहस को तेज कर दिया है। विशेष रूप से ब्राह्मण समाज की प्रतिक्रिया सामने आई, जिसमें आक्रोश और असहमति दोनों दिखाई दिए। लेकिन सवाल केवल एक समाज की प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं है। प्रश्न यह भी है कि जिस “10 प्रतिशत” का उल्लेख किया गया, उसमें अन्य वर्ग भी आते हैं—उनकी आवाज क्यों अपेक्षाकृत शांत रही? और क्या इस पूरे विमर्श को भावनाओं से आगे बढ़ाकर तथ्यों और संवैधानिक दृष्टिकोण से देखने की जरूरत नहीं है?
संख्या आधारित राजनीतिक विमर्श भारत में नया नहीं है। चुनावी गणित, सामाजिक प्रतिनिधित्व और आरक्षण की बहसें लंबे समय से इसी भाषा में चलती रही हैं। लेकिन जब आंकड़े पहचान की राजनीति का औजार बन जाते हैं, तो समाज में अनावश्यक विभाजन की रेखाएं गहरी हो सकती हैं। यही वह बिंदु है जहां परिपक्व संवाद की आवश्यकता महसूस होती है।
ब्राह्मण समाज की तीखी प्रतिक्रिया इस बात का संकेत है कि सम्मान और प्रतिनिधित्व का प्रश्न संवेदनशील है। किसी भी समुदाय को यह महसूस हो कि उसे प्रतीकात्मक रूप से निशाना बनाया जा रहा है, तो प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। लेकिन समान रूप से यह भी विचारणीय है कि “10 प्रतिशत” जैसी अभिव्यक्ति में अनेक सामाजिक समूह शामिल हो सकते हैं। उनकी चुप्पी को कई दृष्टियों से समझा जा सकता है—कुछ इसे राजनीतिक बयानबाजी मानकर अनदेखा कर रहे हों, कुछ सार्वजनिक विवाद से दूरी रखना चाहते हों, और कुछ संभवतः संवाद के शांत मंच की प्रतीक्षा में हों।
यह भी समझना होगा कि यूजीसी या उच्च शिक्षा से जुड़ी नीतियां केवल प्रतिशतों के गणित से नहीं चलतीं। वे संवैधानिक प्रावधानों, सामाजिक न्याय और अवसर की समानता के सिद्धांतों पर आधारित होती हैं। जब चर्चा केवल “हम बनाम वे” की भाषा में सीमित हो जाती है, तो मूल मुद्दे—शिक्षा की गुणवत्ता, समान अवसर, पारदर्शिता और प्रतिभा—पिछड़ जाते हैं।
युवा पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह भावनात्मक उकसावे के बजाय तथ्यात्मक और संवैधानिक दृष्टिकोण अपनाए। सोशल मीडिया के दौर में बयान तेजी से फैलते हैं, लेकिन उतनी ही तेजी से गलतफहमियां भी जन्म लेती हैं। इसलिए आवश्यक है कि युवा वर्ग तर्क, अध्ययन और संवाद के माध्यम से अपनी राय बनाए, न कि केवल नारेबाजी के आधार पर।
राजनीतिक वक्तव्यों का उद्देश्य कई बार समर्थन आधार को मजबूत करना होता है। लेकिन समाज का दायित्व है कि वह दीर्घकालिक प्रभाव को देखे। यदि संख्या आधारित विमर्श आपसी अविश्वास बढ़ाता है, तो अंततः नुकसान पूरे राष्ट्र का होता है। विविधता भारत की शक्ति है; उसे विभाजन की रेखा में बदलना दूरदर्शिता नहीं कही जा सकती।
समाधान का रास्ता संतुलित संवाद में है। यदि किसी बयान से किसी समाज को ठेस पहुंची है, तो स्पष्टीकरण और स्पष्टता आवश्यक है। साथ ही, अन्य वर्गों की चुप्पी को दोष देने के बजाय व्यापक सामाजिक विमर्श की पहल करनी चाहिए, जहां सभी पक्ष अपनी बात शांतिपूर्वक रख सकें।
अंततः प्रश्न केवल 90 और 10 का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या हम शिक्षा, अवसर और प्रतिनिधित्व जैसे गंभीर विषयों को आंकड़ों की जंग में उलझाकर देखेंगे, या उन्हें संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय हित के दृष्टिकोण से समझेंगे?
भारत का भविष्य संतुलन, समावेश और संवाद पर निर्भर करता है। आंकड़े बदल सकते हैं, राजनीतिक बयान भी बदलते रहेंगे, लेकिन समाज की एकता और शिक्षा की गुणवत्ता ही वह आधार है जिस पर राष्ट्र की प्रगति टिकती है।

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article