शुभम कटियार
किशोरावस्था और युवावस्था वह दौर है जब शरीर तेजी से बदलता है। आवाज, कद, शारीरिक बनावट, भावनाएं और सोच—सब कुछ एक साथ बदलता दिखाई देता है। इन परिवर्तनों के पीछे सबसे बड़ी भूमिका हार्मोन्स की होती है। हार्मोन्स हमारे शरीर के केमिकल मैसेंजर हैं, जो विकास, ऊर्जा, मूड और व्यवहार को नियंत्रित करते हैं। इसलिए जब कहा जाता है कि “युवा खून गर्म होता है”, तो इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी हैं।
टीनएज में टेस्टोस्टेरोन, एस्ट्रोजन और ग्रोथ हार्मोन जैसे तत्व तेजी से सक्रिय होते हैं। लड़कों में मांसपेशियों का विकास, दाढ़ी-मूंछ आना और आवाज में बदलाव टेस्टोस्टेरोन से जुड़ा होता है। वहीं लड़कियों में शारीरिक संरचना का विकास और मासिक चक्र की शुरुआत एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन के कारण होती है। यह सब एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसे समझने की जरूरत है, डरने की नहीं।
लेकिन हार्मोनल बदलाव केवल शरीर तक सीमित नहीं रहते। मूड स्विंग, गुस्सा, आकर्षण, भावनात्मक उतार-चढ़ाव और कभी-कभी आक्रामकता भी इसी का हिस्सा हो सकते हैं। कई बार युवा खुद को समझ नहीं पाते कि अचानक इतनी बेचैनी या उत्तेजना क्यों महसूस हो रही है। ऐसे में सही मार्गदर्शन और संवाद बेहद जरूरी है। परिवार और शिक्षकों को चाहिए कि वे युवाओं से खुलकर बात करें, न कि उन्हें चुप करा दें।
आज के दौर में एक नई चुनौती भी सामने आई है—सोशल मीडिया और “फास्ट रिजल्ट” संस्कृति। जिम बॉडी, परफेक्ट लुक और आकर्षण को लेकर दबाव इतना बढ़ गया है कि कुछ युवा बिना डॉक्टर की सलाह के सप्लीमेंट्स या हार्मोन बढ़ाने वाले उत्पाद लेने लगते हैं। यह बेहद खतरनाक हो सकता है। कृत्रिम तरीके से हार्मोन स्तर बढ़ाने से शरीर का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे लंबे समय में गंभीर दुष्प्रभाव हो सकते हैं।
युवाओं को यह समझना होगा कि हार्मोनल ऊर्जा को सही दिशा देना ही असली परिपक्वता है। खेल, योग, ध्यान, पढ़ाई, रचनात्मक गतिविधियां और सकारात्मक संगति इस ऊर्जा को संतुलित करती हैं। नियमित व्यायाम और संतुलित आहार से शरीर का हार्मोन संतुलन स्वाभाविक रूप से बेहतर रहता है।
मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि लगातार तनाव, अवसाद, अत्यधिक गुस्सा या असामान्य व्यवहार दिखे, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना कमजोरी नहीं, समझदारी है। हार्मोनल बदलाव जीवन का सामान्य हिस्सा हैं, लेकिन उनका प्रभाव हर व्यक्ति पर अलग हो सकता है।
युवावस्था ऊर्जा का स्वर्णिम काल है। यह वह समय है जब सपने आकार लेते हैं और व्यक्तित्व मजबूत होता है। जरूरी है कि उभरते हार्मोन्स को गलत दिशा में बहने न दिया जाए, बल्कि उन्हें अनुशासन, समझ और सकारात्मक सोच के साथ जीवन निर्माण में लगाया जाए। संतुलन ही असली शक्ति है—और यही सच्चे अर्थों में परिपक्वता की पहचान भी।






