
शरद कटियार
क्या थे ‘भूसूर’? कैसे बनी जातीय संरचना? इतिहास, धर्म और सामाजिक यथार्थ की पड़ताल
भारत की सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में मानी जाती है। वैदिक काल (लगभग 1500–600 ईसा पूर्व) से लेकर उत्तर वैदिक काल और बाद के धर्मशास्त्रीय युग तक समाज में अनेक व्यवस्थाएँ विकसित हुईं। इन्हीं में वर्ण व्यवस्था, मठ परंपरा और सामाजिक पदानुक्रम शामिल थे। इतिहास का यह अध्याय जितना गौरवशाली है, उतना ही जटिल भी।
ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में चार वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का उल्लेख मिलता है। कई इतिहासकारों का मत है कि प्रारंभिक व्यवस्था कर्म आधारित थी, जन्म आधारित नहीं। परंतु समय के साथ यह संरचना जन्म आधारित सामाजिक ढाँचे में परिवर्तित हो गई। उत्तर वैदिक काल और फिर धर्मशास्त्रीय युग में यह विभाजन अधिक स्थायी और कठोर होता गया।
मनुस्मृति, जिसे लगभग 200 ईसा पूर्व से 200 ईस्वी के बीच रचित माना जाता है, में सामाजिक आचरण, कर्तव्यों और मर्यादाओं का विस्तृत वर्णन है। समय के साथ जातीय उपविभाजन बढ़ते गए। 1931 की ब्रिटिश जनगणना में भारत में 3,000 से अधिक जातीय समूह दर्ज किए गए थे। यह संख्या बताती है कि सामाजिक संरचना अत्यंत जटिल और बहुस्तरीय बन चुकी थी।
‘भूसूर’ शब्द संस्कृत से निकला है, जिसका अर्थ है “पृथ्वी के देवता”। प्राचीन ग्रंथों में यह संबोधन मुख्यतः ब्राह्मणों के लिए प्रयुक्त हुआ। ऐतिहासिक रूप से ब्राह्मणों को कई क्षेत्रों में विशेष सामाजिक सुविधाएँ प्राप्त थीं — जैसे राजाओं द्वारा भूमि दान (अग्रहार), कर में छूट, धार्मिक अनुष्ठानों पर अधिकार और गुरुकुल परंपरा के माध्यम से शिक्षा पर प्रभाव। हालांकि यह व्यवस्था पूरे भारत में एक समान नहीं थी; विभिन्न क्षेत्रों में सामाजिक संरचना और अधिकारों में भिन्नताएँ थीं।
8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित माने जाने वाले चार प्रमुख मठ श्रृंगेरी, द्वारका, पुरी और ज्योतिर्मठ भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के केंद्र बने। मठाधीशों की भूमिका आध्यात्मिक मार्गदर्शन, दर्शन और परंपरा के संरक्षण की थी। मुख्यधारा के ऐतिहासिक शोध में यह प्रमाणित नहीं है कि किसी व्यापक स्तर पर दलित कन्याओं को मठों को दिए जाने की संगठित परंपरा रही हो। हाँ, मध्यकालीन समाज में स्त्रियों और निम्नवर्ग के साथ अन्याय और शोषण के उदाहरण अवश्य मिलते हैं, पर उन्हें किसी एक धार्मिक आदेश या संस्था से सार्वभौमिक रूप से जोड़ना इतिहास की दृष्टि से सिद्ध नहीं है।
‘हरिजन’ शब्द का प्रयोग महात्मा गांधी ने 1930 के दशक में उन समुदायों के लिए किया जिन्हें तब “अछूत” कहा जाता था। इसका अर्थ था “भगवान के लोग”। यह शब्द भक्ति परंपरा में भी मिलता है। किंतु डॉ. भीमराव आंबेडकर और अनेक दलित चिंतकों ने इसे संरक्षणवादी बताया। स्वतंत्र भारत में संवैधानिक रूप से स्वीकृत शब्द “अनुसूचित जाति” है। 2011 की जनगणना के अनुसार अनुसूचित जातियों की आबादी लगभग 16.6 प्रतिशत है।
19वीं सदी तक देश के अनेक हिस्सों में अस्पृश्यता प्रचलित थी। 1850 का कास्ट डिसाबिलिटीज रिमूवल एक्ट सामाजिक प्रतिबंधों को कम करने का प्रारंभिक कानूनी प्रयास था। 1950 में लागू भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 ने अस्पृश्यता को अपराध घोषित कर दिया। यह सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम था।
इतिहास यह स्वीकार करता है कि सामाजिक असमानता रही है। परंतु हर असमानता को किसी एक धार्मिक मत, वर्ण या समुदाय पर आरोपित कर देना इतिहास का सरलीकरण होगा। सत्ता, परंपरा और सामाजिक मानसिकता—इन तीनों के जटिल संबंधों ने समय-समय पर व्यवस्था को कठोर बनाया। वहीं सुधार आंदोलनों, संत परंपरा, समाज सुधारकों और संविधान ने उसे चुनौती भी दी।
आज विमर्श का केंद्र यह होना चाहिए कि क्या 5,000 वर्ष पुरानी संरचनाओं की मानसिकता अब भी हमारे समाज में जीवित है? क्या सामाजिक सुधार पर्याप्त हैं? क्या राजनीतिक बयान इन संवेदनशील विषयों को और भड़काते हैं या समाधान की दिशा दिखाते हैं?
भारत का इतिहास गौरव और पीड़ा दोनों से भरा है। प्रश्न केवल यह नहीं कि अतीत में क्या हुआ; प्रश्न यह है कि वर्तमान में हम क्या कर रहे हैं। दोषी तलाशने से अधिक आवश्यक है सुधार का संकल्प। सामाजिक न्याय, समान अवसर और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता ही वह मार्ग है जो इतिहास की परतों से निकलकर भविष्य की दिशा तय कर सकता है।






