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Thursday, February 26, 2026

देवदासी से अस्पृश्यता तक- सच, सत्ता और समाज का आईना

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शरद कटियार
भारत की सभ्यता को दुनिया की सबसे प्राचीन और आध्यात्मिक सभ्यताओं में गिना जाता है। वेद, उपनिषद, गीता, दर्शन—यह सब हमारी बौद्धिक धरोहर हैं। लेकिन इसी इतिहास की परतों में सामाजिक भेदभाव, अस्पृश्यता और स्त्री-शोषण जैसे अध्याय भी दर्ज हैं। सवाल यह नहीं कि इतिहास में गलती हुई या नहीं; सवाल यह है कि हम उसे ईमानदारी से स्वीकार करते हैं या नहीं।
प्राचीन ग्रंथों में वर्ण व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। कई विद्वानों का मत है कि प्रारंभिक दौर में यह कर्म आधारित थी, जन्म आधारित नहीं। परंतु उत्तर वैदिक काल और उसके बाद धीरे-धीरे यह व्यवस्था जन्म से जुड़ गई। समय के साथ हजारों जातियाँ और उपजातियाँ बन गईं। 1931 की ब्रिटिश जनगणना में 3,000 से अधिक जातीय समूह दर्ज किए गए थे। स्वतंत्र भारत की 2011 की जनगणना बताती है कि अनुसूचित जातियों की आबादी लगभग 16.6% है। ये आँकड़े इस बात के गवाह हैं कि सामाजिक विभाजन कोई मिथक नहीं, बल्कि संरचनात्मक वास्तविकता रहा है।
मठ और पीठों की परंपरा ने भारतीय आध्यात्मिक जीवन को दिशा दी। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित मठों ने दर्शन और संस्कृति को बचाए रखा। लेकिन इतिहास केवल आदर्शों का नहीं होता; वह मनुष्य की कमजोरियों का भी दस्तावेज होता है। जब धार्मिक संस्थाएँ सत्ता से जुड़ती हैं, तब सामाजिक पदानुक्रम मजबूत हो सकता है। भूमि दान, कर छूट, राजकीय संरक्षण—ऐसी व्यवस्थाओं ने धार्मिक नेतृत्व को विशेष सामाजिक हैसियत दी। यह कहना गलत होगा कि हर मठ शोषण का केंद्र था, लेकिन यह भी उतना ही गलत होगा कि इतिहास में कभी दुरुपयोग नहीं हुआ।
दक्षिण भारत में प्रचलित देवदासी प्रथा इसका उदाहरण है। प्रारंभ में इसे मंदिर सेवा और भक्ति से जोड़ा गया, पर समय के साथ कई क्षेत्रों में यह स्त्री-शोषण का माध्यम बन गई। समाज सुधार आंदोलनों ने 19वीं और 20वीं सदी में इसके विरुद्ध आवाज उठाई। आज विभिन्न राज्यों में इस पर कानूनी प्रतिबंध है। यह बताता है कि धार्मिक परंपरा का आवरण कभी-कभी सामाजिक अन्याय को ढँक सकता है, यदि समाज प्रश्न न उठाए।
अस्पृश्यता भारतीय समाज का सबसे पीड़ादायक अध्याय रही है। अनेक क्षेत्रों में दलित समुदाय को मंदिर प्रवेश, शिक्षा, सार्वजनिक कुओं और सामाजिक अवसरों से वंचित रखा गया। 1850 का कास्ट दिसाबिलिटीज रिमूवल एक्ट पहला कानूनी प्रयास था। स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान ने अनुच्छेद 17 के माध्यम से अस्पृश्यता को अपराध घोषित किया। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने स्पष्ट कहा था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब सामाजिक समानता स्थापित हो।
“हरिजन” शब्द को लेकर भी भ्रम और विवाद रहा है। ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार महात्मा गांधी ने 1930 के दशक में यह शब्द लोकप्रिय किया, जिसका अर्थ “भगवान के जन” बताया गया। यह शब्द भक्ति परंपरा, विशेषकर संत नरसी मेहता के पदों में भी मिलता है। परंतु कई दलित चिंतकों और स्वयं डॉ. आंबेडकर ने इस शब्द को संरक्षणवादी बताया। इसलिए आज संवैधानिक शब्द “अनुसूचित जाति” है। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि “हरिजन” शब्द की उत्पत्ति किसी मठीय प्रथा या किसी कथित सामाजिक संबंध से हुई—ऐसा कोई प्रमाणित ऐतिहासिक आधार उपलब्ध नहीं है। लोककथाएँ और आरोप अलग बात हैं; दस्तावेजी इतिहास अलग।
इतिहास में यह भी सच है कि सामंती समाज में कमजोर वर्गों, विशेषकर स्त्रियों और निम्न जातियों, के साथ अन्याय हुआ। परंतु हर अन्याय को किसी एक धर्म, किसी एक वर्ण या किसी एक संस्था पर आरोपित कर देना इतिहास की जटिलता को सरल बनाना होगा। सत्ता जहाँ भी केंद्रित होती है, वहाँ दुरुपयोग की संभावना रहती है—चाहे वह धार्मिक सत्ता हो, राजसत्ता हो या आर्थिक सत्ता।
आज जब राजनीति में प्रतिशत, पहचान और सामाजिक समीकरण की भाषा चलती है, तब 5,000 साल पुराने इतिहास की व्याख्याएँ फिर उभरती हैं। पर हमें यह तय करना होगा कि इतिहास का उपयोग प्रतिशोध के लिए करेंगे या सुधार के लिए। आँकड़े आग लगा सकते हैं, पर सच का काम रोशनी देना है।
नए भारत में बराबरी का आधार संविधान है, न कि जन्म। अगर हम सच में परिवर्तन चाहते हैं तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि अतीत में अन्याय हुआ, सुधार भी हुआ, और अभी भी बहुत कुछ बाकी है। सामाजिक सम्मान किसी उपाधि से नहीं, समान अवसर से आता है।
सवाल सीधा है—क्या हम इतिहास को हथियार बनाएंगे, या आईना?
निर्णय समाज को करना है।

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