– मेहनत से दूरी और ‘शॉर्टकट संस्कृति’ का मनोवैज्ञानिक सच
यूथ इंडिया
आज का युवा महत्वाकांक्षी है, ऊर्जावान है, सपने बड़े हैं। लेकिन इसी के साथ एक नई प्रवृत्ति तेजी से उभर रही है—बिना मेहनत के जल्दी चर्चित होने की चाह। सोशल मीडिया के दौर में प्रसिद्धि का आकर्षण इतना तीव्र हो गया है कि कई युवा सफलता की प्रक्रिया से ज्यादा उसके परिणाम पर केंद्रित हो गए हैं। प्रश्न यह है कि क्या यह शॉर्टकट मानसिकता अंततः निराशा और हार की ओर ले जाती है?
भारत में लगभग 65% आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है।
इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 80 करोड़ से अधिक आंकी जाती है।
विभिन्न सर्वे बताते हैं कि 18–30 आयु वर्ग का बड़ा हिस्सा प्रतिदिन 3–5 घंटे सोशल मीडिया पर बिताता है।
मानसिक स्वास्थ्य रिपोर्ट्स के अनुसार युवाओं में चिंता (एंग्जायटी ) और अवसाद (डिप्रेशन ) के मामले बढ़े हैं।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि डिजिटल दुनिया युवा जीवन का बड़ा हिस्सा बन चुकी है।
‘वायरल’ संस्कृति के मनोविज्ञान
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे
इंस्टाग्राम ,यूट्यूब और फेसबुक
ने प्रसिद्धि को लोकतांत्रिक बना दिया है। अब कोई भी व्यक्ति एक वीडियो से रातों-रात चर्चा में आ सकता है।लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब प्रसिद्धि को ही सफलता मान लिया जाता है।
कौशल विकास की बजाय “ट्रेंड फॉलो” प्राथमिकता बन जाता है।
तुलना आत्मविश्वास को कमजोर करने लगती है। बिना मेहनत सफलता क्यों टिकती नहीं? इसका मुख्य कारण होता है कौशल का अभाव यदि प्रसिद्धि मेहनत या प्रतिभा पर आधारित नहीं है, तो वह स्थायी नहीं रहती।मानसिक दबाव में अचानक मिली पहचान को बनाए रखने का तनाव पैदा होता वहीं
स्वयं की वास्तविक योग्यता का विकास नहीं हो पाता।विफलता का डर – जब अगला कंटेंट वायरल नहीं होता, तो निराशा गहराती है।
इतिहास गवाह है कि स्थायी सफलता का आधार निरंतर परिश्रम, अनुशासन और धैर्य रहा है।शॉर्टकट मानसिकता के परिणाम
प्रतियोगी परीक्षाओं में धैर्य की कमी
स्टार्टअप शुरू कर जल्द छोड़ देना
तुरंत धन कमाने के अवैध रास्तों की ओर झुकाव पैदा करते हैँ, और फिर
अवसाद और आत्मसम्मान में गिरावट आती है।
कई मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि लगातार “तुलना संस्कृति” (कंपरीजन कल्चर ) आत्म-संतोष को नष्ट कर देती है।
लंबी अवधि का लक्ष्य निर्धारित करें।कौशल (स्किल ) आधारित विकास पर ध्यान दें।सोशल मीडिया को साधन मानें, लक्ष्य नहीं।असफलता को सीखने की प्रक्रिया समझें।मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें। मेहनत का कोई विकल्प नहीं भारत के वैज्ञानिक, खिलाड़ी, लेखक और उद्योगपति—सभी की सफलता की कहानी एक बात स्पष्ट करती है,दीर्घकालिक सफलता का आधार निरंतर परिश्रम है, न कि त्वरित प्रसिद्धि।वायरल होना उपलब्धि हो सकती है, लेकिन चरित्र निर्माण और ज्ञान ही स्थायी पहचान बनाते हैं।
युवा मन में ऊर्जा अपार है। लेकिन यदि यह ऊर्जा बिना दिशा के केवल त्वरित प्रसिद्धि की दौड़ में खर्च हो जाए, तो परिणाम अक्सर निराशा और आत्म-संघर्ष के रूप में सामने आते हैं।जीवन एक लंबी यात्रा है।
वायरल वीडियो 30 सेकंड का हो सकता है,लेकिन सफलता की कहानी वर्षों की तपस्या मांगती है।
युवा को यह समझना होगा कि मेहनत से मिली पहचान देर से आती है, पर स्थायी होती है।






