– बढ़ेगी? स्कूल की किताबों पर टैक्स का सवाल और शिक्षा की हकीकत
यूथ इंडिया
भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। हम 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की बात करते हैं, वैश्विक शक्ति बनने का सपना देखते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या मजबूत शिक्षा व्यवस्था के बिना यह संभव है? हाल के वर्षों में स्कूल की किताबों, स्टेशनरी और शैक्षणिक सामग्री पर टैक्स को लेकर जो बहस उठी है, उसने शिक्षा की प्राथमिकता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।
भारत की साक्षरता दर लगभग 77–78% के आसपास मानी जाती है (जनगणना और विभिन्न सरकारी आकलनों के अनुसार)।
महिला साक्षरता दर पुरुषों की तुलना में अभी भी कम है।
ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की गुणवत्ता और पहुंच शहरी क्षेत्रों से कमजोर है।
कई राज्यों में सरकारी स्कूलों में शिक्षक पद रिक्त हैं।
शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय जीडीपी का लगभग 3%–4% के बीच रहा है, जबकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इसे 6% तक ले जाने की बात कही गई है।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि शिक्षा अभी भी राष्ट्रीय प्राथमिकता की सूची में उतनी ऊपर नहीं है, जितनी होनी चाहिए।
यह समझना आवश्यक है कि स्कूल की पाठ्यपुस्तकों पर सामान्यतः जीएसटी शून्य (0%) है। लेकिन कॉपी, स्टेशनरी, बैग, पेंसिल बॉक्स, ड्राइंग सामग्री जैसी वस्तुओं पर अलग-अलग दरों से जीएसटी लगाया जाता है। यहीं से विवाद शुरू होता है।
एक सामान्य परिवार, जिसके दो बच्चे प्राइवेट स्कूल में पढ़ते हैं, उसे हर साल किताबें, कॉपी, यूनिफॉर्म और अन्य सामग्री पर हजारों रुपये खर्च करने पड़ते हैं। मध्यम और निम्न आय वर्ग के लिए यह बोझ बढ़ता जा रहा है।
सवाल यह है कि यदि शिक्षा को मौलिक अधिकार माना गया है, तो उससे जुड़ी हर आवश्यक सामग्री पर कर क्यों?
इतिहास गवाह है कि जहां शिक्षा का स्तर कम होता है, वहां आलोचनात्मक सोच (क्रिटिकल थिंकिंग) भी सीमित रहती है।
कम पढ़े-लिखे समाज में भावनात्मक और धार्मिक नारों का प्रभाव अधिक होता है।
तथ्यात्मक विश्लेषण की बजाय भीड़-मानसिकता हावी हो सकती है।
लोकतंत्र में जागरूक मतदाता ही मजबूत सरकार और जवाबदेह व्यवस्था सुनिश्चित करते हैं।
इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि शिक्षा का स्तर जितना ऊंचा होगा, लोकतंत्र उतना परिपक्व होगा।
सरकारें डिजिटल इंडिया, स्मार्ट क्लास और ऑनलाइन लर्निंग की बात करती हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई ग्रामीण स्कूलों में अभी भी बुनियादी ढांचा कमजोर है।बिजली और इंटरनेट की नियमित उपलब्धता नहीं है।
डिजिटल डिवाइस हर परिवार की पहुंच में नहीं हैं।यदि बुनियादी शिक्षा मजबूत नहीं होगी, तो डिजिटल क्रांति भी अधूरी रह जाएगी।
समाधान क्या?शिक्षा पर खर्च बढ़ाया जाए।शैक्षणिक सामग्री को पूरी तरह टैक्स मुक्त किया जाए।
सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में सुधार हो।शिक्षकों की भर्ती और प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाए।
आलोचनात्मक सोच और नागरिक शिक्षा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए।
“अनपढ़ रहेगा इंडिया, तभी तो अंध-भक्त बनेगा इंडिया” यह एक भावनात्मक वाक्य है, लेकिन इसके पीछे चिंता वास्तविक है। लोकतंत्र की मजबूती शिक्षा पर निर्भर करती है। यदि शिक्षा महंगी होती गई, तो असमानता बढ़ेगी और सामाजिक ध्रुवीकरण गहरा होगा।भारत को अगर विश्वगुरु बनना है, तो सबसे पहले उसे शिक्षा को पूरी तरह सुलभ, सस्ती और गुणवत्तापूर्ण बनाना होगा। किताबों पर टैक्स की बहस केवल आर्थिक मुद्दा नहीं है, यह देश के भविष्य का सवाल है।






