| यूथ इंडिया
सनातन परंपरा के अनुसार सृष्टि की संरचना केवल इस दृश्य पृथ्वी तक सीमित नहीं है। वेद, पुराण और उपनिषदों में चौदह लोकों का वर्णन मिलता है — सात ऊर्ध्व लोक और सात अधोलोक। इन समस्त लोकों के मध्य स्थित है पृथ्वी लोक (भूलोक) — वह स्थान जहाँ मनुष्य जन्म लेता है, कर्म करता है, धर्म का पालन करता है और अपने निर्णयों से अपने भविष्य का निर्माण करता है।
पृथ्वी लोक को केवल रहने का स्थान नहीं, बल्कि कर्म, धर्म और निर्णय का प्रयोगशाला कहा गया है। यहाँ किया गया प्रत्येक कार्य फलदायी होता है। यही कारण है कि मनुष्य जीवन को देवताओं से भी दुर्लभ बताया गया है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”अर्थात मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल पर नहीं।
यह उपदेश स्पष्ट करता है कि पृथ्वी लोक में जन्म लेने का उद्देश्य कर्म करना है। यहाँ का प्रत्येक क्षण निर्णय का क्षण है। सही और गलत के बीच चुनाव ही मनुष्य को श्रेष्ठ बनाता है।
इसी प्रकार गरुड़ पुराण और अन्य पुराणों में वर्णन है कि मनुष्य के कर्म ही उसके अगले जन्म और लोक की दिशा तय करते हैं। इसलिए पृथ्वी लोक को “मुक्ति का द्वार” भी कहा गया है।
कर्म और धर्म एक-दूसरे के पूरक हैं।
कर्म – हमारे द्वारा किए गए कार्य
धर्म – उन कार्यों की नैतिकता और सत्यता यदि कर्म ईमानदारी, सत्य और करुणा से प्रेरित हो, तो वही भगवत कर्म बन जाता है। भगवत कर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि ऐसा हर कार्य है जिससे समाज, परिवार और राष्ट्र का कल्याण हो।
आज के समय में जब स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, तब धर्म के मार्ग पर चलना ही सच्ची साधना है। कार्यालय में ईमानदारी, समाज में सहयोग, प्रशासन में निष्पक्षता और परिवार में प्रेम — यही आधुनिक युग का धर्म है।
मनुष्य को केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए भी जीना चाहिए।लोक कल्याण का अर्थ है जरूरतमंद की सहायता,
पर्यावरण की रक्षा,
शिक्षा और स्वास्थ्य में योगदान करना,अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना ।
जब व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज के लिए कार्य करता है, तभी उसका जीवन सार्थक होता है। इतिहास गवाह है कि जिन लोगों ने लोक कल्याण को अपना लक्ष्य बनाया, वे आज भी स्मरण किए जाते हैं।लोक कल्याण का कार्य केवल बड़े पद या धन से ही संभव नहीं। छोटी-छोटी ईमानदार कोशिशें भी समाज में बड़ा परिवर्तन ला सकती हैं।
पृथ्वी लोक में हर दिन हमें निर्णय लेने होते हैं – सत्य या असत्य, न्याय या अन्याय, सेवा या स्वार्थ।यही निर्णय हमारी आत्मा को ऊँचा या नीचा बनाते हैं। यदि हम नियमों का पालन ईमानदारी से करते हैं और ईश्वर द्वारा दिए गए जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करते हैं, तो वही सच्चा धर्म है।
मनुष्य जीवन क्षणभंगुर है, पर उसके कर्म अमर होते हैं। इसलिए आवश्यक है कि हम अपने प्रत्येक निर्णय को समाज और मानवता के हित में लें।
चौदह लोकों में पृथ्वी लोक वह पवित्र भूमि है जहाँ मनुष्य अपने कर्मों से अपनी दिशा तय करता है। यहाँ ईमानदारी से नियमों का पालन करना, धर्म के मार्ग पर चलना और लोक कल्याण के लिए कार्य करना ही सच्चा भगवत कर्म है।
जब प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को समाज के हित में समर्पित करेगा, तब पृथ्वी लोक वास्तव में स्वर्ग के समान बन सकता है।

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