भारत में यौन अपराध से संबंधित कानून—विशेषकर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375–376 और POCSO—समय-समय पर संशोधित हुए हैं ताकि पीड़ितों को बेहतर संरक्षण और कठोर दंड सुनिश्चित किया जा सके। 2013 के आपराधिक कानून संशोधन के बाद “बलात्कार” की परिभाषा का दायरा व्यापक किया गया, जिसमें सहमति के बिना किसी भी प्रकार की लैंगिक पैठ (penetration) को अपराध माना गया।
फिर भी, न्यायालयों के कुछ आदेशों को लेकर सार्वजनिक बहस समय-समय पर तेज़ होती रही है—विशेषकर तब, जब किसी कृत्य को “बलात्कार” की श्रेणी में न मानने या कम गंभीर धारा में देखने की व्याख्या सामने आती है।
विवादित आदेशों पर बहस
कभी-कभी ऐसे आदेशों की चर्चा होती है जिनमें “नाड़ा तोड़ना” या “योनि पर लिंग रखकर वीर्यपात करना” जैसे कृत्यों को, तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर, बलात्कार की श्रेणी में न माना गया।
यहाँ दो महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु समझना आवश्यक हैं:
कानूनी परिभाषा और साक्ष्य: IPC की धारा 375 के अनुसार, “penetration” (भले ही आंशिक) को पर्याप्त माना जाता है। यदि अदालत को उपलब्ध साक्ष्यों से पैठ सिद्ध नहीं होती, तो वह अलग धारा लागू कर सकती है—जैसे यौन उत्पीड़न या छेड़छाड़ से संबंधित प्रावधान। अदालतें प्रत्येक मामले का निर्णय उसके तथ्यों, मेडिकल व फोरेंसिक रिपोर्ट और गवाहियों के आधार पर करती हैं। इसलिए कोई आदेश व्यापक सिद्धांत की जगह विशेष परिस्थितियों पर आधारित हो सकता है।
यही वह बिंदु है जहाँ सार्वजनिक धारणा और न्यायिक व्याख्या के बीच दूरी बनती है।
जब किसी आदेश में अपेक्षित कठोर धारा लागू नहीं होती, तो समाज में यह संदेश जा सकता है कि कानून “नरम” पड़ गया है।
दूसरी ओर, अदालतों का तर्क यह होता है कि वे संदेह से परे प्रमाण (बियॉन्ड रीज़नबल डाउट ) के सिद्धांत पर चलती हैं।
यह संतुलन कठिन है,
कानून कठोर रहे, ताकि निवारक प्रभाव बना रहे।
लेकिन सजा केवल सिद्ध अपराध पर ही हो, ताकि न्यायिक निष्पक्षता कायम रहे।
आज देश में यौन अपराध की धाराओं में दर्ज मामलों की संख्या अधिक है। कुछ मामलों में जांच के बाद धाराएँ हल्की हो जाती हैं या अदालत में आरोप सिद्ध नहीं हो पाते।
समाज में अविश्वास का वातावरण
यदि प्रारंभिक जांच मजबूत हो, साक्ष्य वैज्ञानिक ढंग से जुटाए जाएँ और अभियोजन सुदृढ़ हो, तो न तो गंभीर धाराएँ अनावश्यक रूप से लगेंगी और न ही वास्तविक मामलों में वे कमजोर पड़ेंगी।
स्पष्ट न्यायिक मार्गदर्शिका: यौन अपराध की परिभाषा और लागू धाराओं पर एकरूपता।फोरेंसिक ढांचे को सुदृढ़ करना।
पीड़ित सहायता प्रणाली को मजबूत करना।झूठे मामलों पर भी विधिक कार्रवाई, ताकि कानून का दुरुपयोग हतोत्साहित हो।
यौन अपराध कानून केवल दंड का उपकरण नहीं, बल्कि समाज की नैतिक प्रतिबद्धता का प्रतीक है।
विवादित आदेशों पर बहस लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन समाधान भावनात्मक प्रतिक्रिया में नहीं, बल्कि साक्ष्य-आधारित, संतुलित और पारदर्शी न्याय व्यवस्था में निहित है।
कानून की गरिमा तभी बनी रहेगी जब वह—पीड़ित को विश्वास दे,निर्दोष को संरक्षण दे,और समाज को स्पष्ट संदेश दे कि न्याय न तो कठोरता में अंधा है, न ही उदारता में लापरवाह।
(यूथ इंडिया – विधि एवं समाज विशेष विश्लेषण)

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