चिकित्सा विज्ञान में भारत का अतुलनीय योगदान: महामारी से कोविड तक अग्रसर राष्ट्र

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प्रो. (डॉ.) राजकुमार, निदेशक, राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान

भारत विश्व के उन चुनिंदा देशों में से है, जिसने चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में समय-समय पर ऐसे उल्लेखनीय योगदान दिए हैं, जिनका प्रभाव केवल देश की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था को नई दिशा भी प्रदान की। प्राचीन महामारी प्रबंधन से लेकर आधुनिक समय की कोविड-19 जैसी अभूतपूर्व चुनौती तक—भारत ने हमेशा यह सिद्ध किया है कि उसके पास चिकित्सा ज्ञान, मानवीय मूल्य और वैज्ञानिक क्षमता का ऐसा संयोजन है जो किसी भी संकट का डटकर सामना करने में सक्षम है।
आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी और योग—भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियाँ हजारों वर्षों से मानव स्वास्थ्य को समझने और संवारने का काम कर रही हैं। चरक, सुश्रुत और वाग्भट्ट जैसे चिकित्सकों ने न केवल रोग-निदान और उपचार की बुनियाद रखी, बल्कि सर्जरी, शरीर-रचना और दवाओं के विकास में भी ऐसे मानक स्थापित किए जिनकी चर्चा आज भी वैश्विक चिकित्सा समुदाय करता है।
भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियाँ महामारी नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं—चाहे चेचक हो, मलेरिया हो या हैज़ा—हमारी चिकित्सा प्रणाली ने अपने ज्ञान के आधार पर समय-समय पर समाज को राहत प्रदान की।
स्वतंत्रता के बाद भारत ने स्वास्थ्य सेवाओं और बायोमेडिकल रिसर्च को नई ऊर्जा दी। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), ICMR, NIMHANS, PGI और हमारे जैसे क्षेत्रीय मेडिकल संस्थानों ने चिकित्सा शिक्षा को नई ऊँचाइयाँ दीं। संक्रमण रोगों, टीकाकरण, मातृ-शिशु स्वास्थ्य तथा ग्रामीण स्वास्थ्य मिशनों में भारत के मॉडल को वैश्विक स्तर पर सराहा गया।
पोलियो उन्मूलन का भारतीय मॉडल विश्व के लिए मिसाल है। 20वीं सदी के अंत में जब पोलियो देश में व्यापक था, तब हमारे वैज्ञानिकों, डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों ने जिस समर्पण से कार्य किया, उसके परिणामस्वरूप भारत ने पोलियो को हमेशा के लिए विदा किया—यह मानवता की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है।
कोविड महामारी ने विश्व को झकझोर दिया। परंतु भारत ने अपने सीमित संसाधनों के बावजूद जिस दृढ़ता, गति और नवाचार के साथ इस संकट का सामना किया, उसका उदाहरण दुनिया में कहीं और नहीं मिलता।
हमने न केवल दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान चलाया, बल्कि घर-घर दवाइयाँ पहुँचाईं, लाखों बेड तैयार किए, ऑक्सीजन प्लांट लगाए और डिजिटल स्वास्थ्य प्रणालियों को विकसित किया।
दुनिया की पहली DNA वैक्सीन विकसित करने वाला राष्ट्र,
COVAXIN और Covishield जैसे प्रभावी टीके,
लाखों जीवन बचाने वाली ‘आरोग्य सेतु’ और ‘कोविन’ जैसी डिजिटल प्रणालियाँ,
दवाइयों और PPE किट के निर्माण में आत्मनिर्भरता,
विश्वभर में 200 से अधिक देशों को दवाइयों और वैक्सीन की आपूर्ति।
यह सब न केवल वैज्ञानिक प्रयास था, बल्कि मानवीय कर्तव्य का उदाहरण भी था।
आज भारत बायोटेक्नोलॉजी, जेनेटिक रिसर्च, स्टेम सेल थेरेपी, रोबोटिक सर्जरी, ऑर्गन ट्रांसप्लांट और डिजिटल हेल्थ के क्षेत्र में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।
हमारे संस्थान, विश्वविद्यालय और प्रयोगशालाएँ वैश्विक शोध का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित रोग पहचान, क्लाउड–हेल्थ रिकॉर्ड, पोर्टेबल डायग्नोस्टिक तकनीक और ग्रामीण स्वास्थ्य नवाचार—ये सभी भारत को वैश्विक हेल्थ टेक हब बनाने की दिशा में मजबूत कदम हैं।
महामारियों से लेकर कोविड-19 तक भारत की चिकित्सा यात्रा केवल शोध और विज्ञान की कहानी नहीं है, यह हमारी मानवीय संवेदनशीलता, टीमवर्क और राष्ट्र सेवा की भावना की कहानी है।
हमारा देश आज भी वही है—जो संकट में भी सृजन करता है और चुनौतियों में भी समाधान ढूँढता है।
भारत ने बार-बार यह साबित किया है कि वह न केवल अपने लोगों का, बल्कि पूरे विश्व का स्वास्थ्य संरक्षक बनने की क्षमता रखता है।
और आने वाले वर्षों में यह क्षमता और अधिक मजबूत होकर विश्व मंच पर चमकेगी।

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