भरत चतुर्वेदी
महाशिवरात्रि भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का एक ऐसा पर्व है, जो केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक चेतना, आत्मसंयम और जीवन-दर्शन का संदेश देता है। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाने वाला यह पावन पर्व भगवान शिव की उपासना का विशेष अवसर है। इस दिन देशभर के मंदिरों में घंटों की गूंज, मंत्रोच्चार, भजन-कीर्तन और “हर-हर महादेव” के उद्घोष से वातावरण भक्तिमय हो उठता है।
भगवान शिव, जिन्हें महादेव, भोलेनाथ और नीलकंठ जैसे अनेक नामों से पुकारा जाता है, सृष्टि के संहारक होने के साथ-साथ कल्याणकारी देव भी हैं। वे तप और त्याग के प्रतीक हैं, परंतु साथ ही करुणा और सरलता के भी। उनकी आराधना में बाहरी आडंबर की आवश्यकता नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा और निर्मल मन ही पर्याप्त है। यही कारण है कि महाशिवरात्रि का पर्व समाज के हर वर्ग को समान रूप से आकर्षित करता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार इस रात्रि भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। इसलिए कई स्थानों पर शिव-बारात निकाली जाती है और विवाहोत्सव का आयोजन किया जाता है। यह आयोजन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें लोकगीत, नृत्य और परंपराओं का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
महाशिवरात्रि की रात्रि को विशेष रूप से जागरण का महत्व दिया गया है। कहा जाता है कि इस रात शिव तत्व अत्यंत सक्रिय रहता है और साधना का फल कई गुना बढ़ जाता है। भक्त दिनभर व्रत रखते हैं और रात्रि में चार प्रहर की पूजा करते हैं। प्रत्येक प्रहर में शिवलिंग का जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक, दही, शहद और घृत से अभिषेक किया जाता है। बेलपत्र, धतूरा, भांग और अक्षत अर्पित किए जाते हैं। “ॐ नमः शिवाय” और महामृत्युंजय मंत्र का जाप वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है।
शिवलिंग, जो शिव की निराकार सत्ता का प्रतीक है, सृष्टि के अनंत और अखंड स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है। यह हमें बताता है कि ईश्वर किसी सीमित रूप में बंधा नहीं है। महाशिवरात्रि इस निराकार चेतना के साथ जुड़ने का अवसर है। ‘शिव’ का अर्थ है कल्याण और ‘रात्रि’ का अर्थ है अज्ञान का अंधकार। इस प्रकार यह पर्व अज्ञान से ज्ञान की ओर, अशांति से शांति की ओर और नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर बढ़ने का संदेश देता है।
इस दिन कांवड़िए पवित्र नदियों से जल लाकर शिवलिंग पर अर्पित करते हैं। गंगाजल का विशेष महत्व माना गया है, क्योंकि मान्यता है कि गंगा भगवान शिव की जटाओं से प्रवाहित हुई। मंदिरों में विशेष सजावट की जाती है, दीपों और विद्युत रोशनी से परिसर को आलोकित किया जाता है। कई स्थानों पर विशाल मेले लगते हैं, जहां धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की झलक भी मिलती है।
महाशिवरात्रि केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का भी अवसर है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में यह पर्व हमें रुककर अपने भीतर झांकने की प्रेरणा देता है। उपवास का अर्थ केवल भोजन त्याग नहीं, बल्कि इंद्रियों पर नियंत्रण और मन की शुद्धि है। यह संयम, धैर्य और साधना का अभ्यास है।
भगवान शिव का व्यक्तित्व स्वयं में एक संदेश है। वे कैलाश पर विराजमान तपस्वी हैं, परंतु गृहस्थ जीवन भी जीते हैं। वे रौद्र रूप में संहारक हैं, तो शांत रूप में करुणामय भी। उनका गले में सर्प धारण करना भय पर विजय का प्रतीक है, नीलकंठ रूप में विषपान त्याग और लोककल्याण का प्रतीक है। उनका डमरू सृष्टि की लय और ताल का प्रतिनिधित्व करता है, तो त्रिशूल तीन गुणों—सत्त्व, रज और तम—पर नियंत्रण का संकेत देता है।
महाशिवरात्रि हमें संतुलन का पाठ पढ़ाती है। यह सिखाती है कि जीवन में तप और भोग, शक्ति और शांति, त्याग और प्रेम—इन सबका संतुलन आवश्यक है। शिव का स्मरण केवल संकट के समय नहीं, बल्कि हर क्षण जीवन को सकारात्मक दृष्टि से जीने की प्रेरणा देता है।
आज जब समाज तनाव, प्रतिस्पर्धा और असंतुलन से जूझ रहा है, तब महाशिवरात्रि का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह पर्व हमें भीतर की नकारात्मकता को त्यागने, क्षमा और करुणा को अपनाने तथा आत्मबल को जागृत करने की प्रेरणा देता है।
अंततः, महाशिवरात्रि केवल एक रात्रि नहीं, बल्कि आत्मजागरण का अवसर है। यह हमें याद दिलाती है कि अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, शिव का प्रकाश उसे दूर कर सकता है। जब भक्त श्रद्धा से “हर हर महादेव” का उद्घोष करते हैं, तो वह केवल एक धार्मिक आह्वान नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, साहस और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक बन जाता है।
महाशिवरात्रि का यह पावन पर्व हम सभी के जीवन में शांति, संतुलन और कल्याण का संदेश लेकर आए—इसी कामना के साथ।
हर हर महादेव!

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