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Wednesday, February 11, 2026

महंगाई : आम आदमी की कमर पर बोझ

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आंकड़ों की राहत बनाम रसोई की हकीकत
प्रभात यादव
महंगाई केवल एक आर्थिक शब्द नहीं है, यह सीधे-सीधे हर घर की रसोई, हर परिवार के बजट और हर नागरिक की जीवनशैली को प्रभावित करती है। खाद्य पदार्थों की कीमतों में उतार-चढ़ाव, गैस सिलेंडर के दाम, बिजली बिल, बच्चों की स्कूल फीस और स्वास्थ्य सेवाओं की लागत—इन सबने मध्यम और निम्न वर्ग पर दबाव बढ़ा दिया है।
सरकार महंगाई दर को नियंत्रित बताती है, और व्यापक आर्थिक सूचकांक भी कभी-कभी राहत का संकेत देते हैं। लेकिन घर का बजट संभालने वाली गृहिणी की चिंता अलग कहानी कहती है। यदि रसोई का खर्च, किराया, दवा और बच्चों की पढ़ाई लगातार महंगी होती जाए, तो महंगाई “नियंत्रित” होने का दावा आम आदमी को संतोष नहीं दे पाता।
महंगाई का बहुआयामी प्रभाव
महंगाई का असर केवल जेब पर नहीं पड़ता—यह जीवन की गुणवत्ता पर असर डालती है।
पोषण पर प्रभाव: जब खाद्यान्न, दाल, सब्जी और दूध महंगे होते हैं, तो परिवार सस्ते विकल्पों की ओर झुकते हैं। इससे पोषण स्तर प्रभावित होता है।
शिक्षा पर असर: बढ़ती फीस और कोचिंग खर्च गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के बच्चों की शिक्षा पर रोक लगा सकते हैं।
बचत में कमी: जब आय का बड़ा हिस्सा रोजमर्रा के खर्च में चला जाए, तो बचत और निवेश की क्षमता घट जाती है।
स्वास्थ्य संकट: निजी अस्पतालों की बढ़ती लागत और दवाओं के दाम स्वास्थ्य सुरक्षा को चुनौती देते हैं।
महंगाई के कारण
महंगाई के कई कारण होते हैं—
आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएं
अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और खाद्य कीमतों में वृद्धि
परिवहन लागत
जमाखोरी और कालाबाजारी
प्राकृतिक आपदाएं
खाद्य महंगाई अक्सर मौसम और वितरण व्यवस्था से जुड़ी होती है। यदि किसान को उचित दाम नहीं मिलता और उपभोक्ता को महंगा सामान खरीदना पड़ता है, तो समस्या वितरण प्रणाली में है।
खेत से बाजार तक की दूरी कम करनी होगी। कोल्ड स्टोरेज, वेयरहाउस और आधुनिक लॉजिस्टिक्स से बिचौलियों की भूमिका घटाई जा सकती है।
जमाखोरी पर सख्त कार्रवाई:
कृत्रिम कमी पैदा कर कीमतें बढ़ाने वालों के खिलाफ त्वरित और पारदर्शी कार्रवाई जरूरी है।
स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा:
“लोकल फॉर वोकल” केवल नारा नहीं, नीति बननी चाहिए। स्थानीय उद्योग और कृषि उत्पादन मजबूत होंगे तो आयात पर निर्भरता घटेगी और कीमतों में स्थिरता आएगी।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली की मजबूती:
गरीबों तक सस्ती दर पर अनाज और आवश्यक वस्तुएं पहुंचाना महंगाई के प्रभाव को कम कर सकता है।
महंगाई पर नियंत्रण केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं, सामाजिक स्थिरता की शर्त है। जब तक आम नागरिक को राहत महसूस नहीं होगी, तब तक आंकड़ों की सफलता अधूरी रहेगी।
महंगाई की असली परीक्षा बाजार में नहीं, रसोई में होती है।
कृषि संकट : उत्पादन बनाम आय
रिकॉर्ड पैदावार के बावजूद किसान क्यों परेशान?
भारत आज खाद्यान्न उत्पादन में विश्व के अग्रणी देशों में शामिल है। गेहूं, चावल, गन्ना और कई अन्य फसलों के उत्पादन में रिकॉर्ड बनाए जा रहे हैं। लेकिन विडंबना यह है कि उत्पादन बढ़ने के बावजूद किसानों की आय अपेक्षित गति से नहीं बढ़ी।
यह विरोधाभास बताता है कि समस्या उत्पादन में नहीं, संरचना में है।
खेती की लागत लगातार बढ़ रही है डीजल और बिजली खाद और बीज कीटनाशक मजदूरी यदि फसल का बाजार मूल्य इन लागतों को संतुलित न करे, तो किसान की आय घटती है। कई बार उत्पादन अधिक होने पर बाजार में कीमतें गिर जाती हैं, जिससे किसान को नुकसान होता है।
चार स्तंभ जिन पर टिकेगा समाधान
एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य): एमएसपी की घोषणा पर्याप्त नहीं, खरीद व्यवस्था भी मजबूत होनी चाहिए। यदि किसान को घोषित मूल्य पर खरीद की गारंटी नहीं मिलेगी, तो एमएसपी का प्रभाव सीमित रहेगा।
सिंचाई व्यवस्था: वर्षा पर निर्भरता कम करनी होगी। सूखा और बाढ़ दोनों से बचाव के लिए आधुनिक सिंचाई प्रणाली आवश्यक है।
फसल बीमा: प्राकृतिक आपदा या बाजार गिरावट की स्थिति में बीमा तंत्र तेज और पारदर्शी होना चाहिए।
बाजार तक सीधी पहुंच: किसान उत्पादक संगठनों (FPO) और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से किसान को सीधे बाजार से जोड़ना होगा।
कृषि का विविधीकरण
केवल पारंपरिक फसलों पर निर्भरता कम कर बागवानी डेयरी मत्स्य पालन खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में विस्तार से आय बढ़ाई जा सकती है।
कृषि को वोट बैंक से आगे
कृषि को केवल चुनावी वादों तक सीमित रखना दीर्घकालिक समाधान नहीं है। इसे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ के रूप में देखना होगा। यदि किसान की आय स्थिर और सम्मानजनक होगी, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, उपभोग बढ़ेगा और समग्र विकास को गति मिलेगी। उत्पादन में रिकॉर्ड बनाना उपलब्धि है, लेकिन किसान की आय दोगुनी या स्थिर करना असली लक्ष्य होना चाहिए।
कृषि संकट का समाधान केवल समर्थन मूल्य में वृद्धि नहीं, बल्कि संपूर्ण कृषि तंत्र के पुनर्गठन में है।
जब किसान समृद्ध होगा, तभी भारत का विकास संतुलित और स्थायी

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