युवा भारत के सामने अवसर भी, चुनौती भी
भरत चतुर्वेदी
भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश है। लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। यह जनसांख्यिकीय स्थिति किसी भी राष्ट्र के लिए “डेमोग्राफिक डिविडेंड” बन सकती है — बशर्ते युवाओं को शिक्षा, कौशल और रोजगार के पर्याप्त अवसर मिलें। लेकिन यही युवा शक्ति अगर बेरोजगार या अल्प-रोजगार की स्थिति में रहे, तो वही डिविडेंड “डेमोग्राफिक बोझ” में बदल सकता है।
सरकारी आंकड़े बेरोजगारी दर में गिरावट दिखाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति अधिक जटिल है। लाखों युवा एक-एक सरकारी पद के लिए आवेदन कर रहे हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में अभ्यर्थियों की भारी भीड़ और सीमित रिक्तियों का अनुपात रोजगार संकट की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करता है।
आंकड़ों की कहानी बनाम हकीकत
बेरोजगारी को मापने के कई तरीके हैं। कोई व्यक्ति यदि सप्ताह में कुछ घंटे भी काम कर लेता है, तो उसे “रोजगारयुक्त” मान लिया जाता है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या वह काम सम्मानजनक आय देता है? क्या वह स्थायी है? क्या उससे सामाजिक सुरक्षा मिलती है?
आज बड़ी संख्या में युवा कॉन्ट्रैक्ट जॉब, आउटसोर्सिंग और अस्थायी नियुक्तियों में काम कर रहे हैं। गिग इकोनॉमी—जैसे डिलीवरी, कैब सेवाएं, फ्रीलांस डिजिटल कार्य—तेजी से बढ़ी है। यह अवसर तो देती है, पर स्थिरता, पेंशन, मेडिकल सुरक्षा और दीर्घकालिक सुरक्षा का अभाव रहता है।
इस स्थिति में रोजगार की गुणवत्ता उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी संख्या।
सरकारी भर्ती और देरी का संकट
कई राज्यों और केंद्र स्तर पर हजारों पद वर्षों तक रिक्त रहते हैं। भर्ती प्रक्रियाओं में देरी, परीक्षा रद्द होना, पेपर लीक, कोर्ट केस—इन सबने युवाओं के विश्वास को प्रभावित किया है।
जब कोई युवा 4-5 वर्ष तैयारी में लगाता है और भर्ती प्रक्रिया लंबित रह जाती है, तो उसका मानसिक और आर्थिक दोनों स्तर पर नुकसान होता है।
समयबद्ध और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया न केवल रोजगार देगी, बल्कि प्रशासनिक दक्षता भी बढ़ाएगी।
स्किल गैप : डिग्री है, दक्षता नहीं
भारत में हर साल लाखों छात्र स्नातक बनकर निकलते हैं। लेकिन उद्योगों की शिकायत है कि उन्हें प्रशिक्षित और दक्ष कर्मचारी नहीं मिल रहे। यह “स्किल गैप” बड़ी समस्या है।
शिक्षा प्रणाली लंबे समय तक डिग्री-केन्द्रित रही, जबकि आज उद्योगों को तकनीकी दक्षता, डिजिटल कौशल, विश्लेषण क्षमता और व्यवहारिक प्रशिक्षण चाहिए।
भारत की अर्थव्यवस्था में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (MSME) रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत हैं। यदि इन्हें सस्ता ऋण, सरल नियम और बाजार तक पहुंच मिले, तो ये बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित कर सकते हैं।
स्टार्टअप संस्कृति ने भी नई संभावनाएं खोली हैं। लेकिन हर स्टार्टअप सफल नहीं होता। इसलिए उद्यमिता को बढ़ावा देने के साथ जोखिम प्रबंधन और वित्तीय साक्षरता भी जरूरी है।
बेरोजगारी केवल शहरों का मुद्दा नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि पर निर्भरता अधिक है, लेकिन खेती की आय सीमित है।
यदि ग्रामीण उद्योग—जैसे खाद्य प्रसंस्करण, हस्तशिल्प, डेयरी, मत्स्य पालन—को बढ़ावा दिया जाए, तो स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजित हो सकता है और शहरों की ओर पलायन कम होगा।
मनरेगा जैसी योजनाएं अल्पकालिक राहत देती हैं, लेकिन स्थायी समाधान ग्रामीण औद्योगिकीकरण में है।
बेरोजगारी केवल आर्थिक समस्या नहीं है। इसका असर सामाजिक स्थिरता, अपराध दर, मानसिक स्वास्थ्य और पारिवारिक संरचना पर भी पड़ता है।
लंबे समय तक बेरोजगार रहने से आत्मविश्वास घटता है, अवसाद बढ़ता है और सामाजिक असंतोष जन्म लेता है।
इसलिए रोजगार सृजन को केवल बजटीय आंकड़े या राजनीतिक घोषणा तक सीमित नहीं रखा जा सकता—यह राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए।
भारत के पास अवसर है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव, डिजिटल क्रांति, हरित ऊर्जा और विनिर्माण क्षेत्र में संभावनाएं मौजूद हैं।
जरूरत हैशिक्षा और उद्योग के बीच तालमेल पारदर्शी भर्ती,
उद्यमिता को प्रोत्साहन,
निवेश को जमीन पर उतारना
महिला और ग्रामीण रोजगार पर विशेष ध्यान देना जरुरी है।
बेरोजगारी भारत के विकास की सबसे बड़ी परीक्षा है। यदि युवा शक्ति को सही दिशा और अवसर मिले, तो भारत विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्था बन सकता है।
लेकिन यदि रोजगार सृजन की गति जनसंख्या वृद्धि से पीछे रही, तो विकास के दावे अधूरे रह जाएंगे।
रोजगार केवल आय का साधन नहीं यह सम्मान, स्थिरता और राष्ट्र निर्माण की नींव है।

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