अशोक मधुप
वरिष्ठ पत्रकार
भारतीय मंदिरों में पूजा-पाठ के दौरान अर्पित किए जाने वाले पुष्प, नारियल आदि सामान न केवल हमारी गहरी आस्था का प्रतीक हैं। बल्की हमारे लिए वह सम्माननीय हैं। देखने में आता रहा है कि पूजन के बाद मंदिर प्रबंधन द्वारा इन्हें इधर – उधार फिंकवा दिया जाता है। कई जगह ये सड़कों के किनारे पड़े सड़ते रहते हैं। जहां नदियां हैं , वहां नदियों में डाल दिए जाते हैं। नदियों में डाल दिए जाने से वे प्रदूषित होती रहती हैं। भगवान को श्रद्धा से चढ़ाई सामग्री का ये दुर्गति देख अच्छा नही लगता। ये सामग्री थोड़ी− बहुत हो तो प्रबंधन कुछ सोचे भी। रोज कई− कई सौ क्विंटल सामग्री हो जाती है। इसके निस्तारण की बडी समस्या रहती है।ऐसे में प्रबंधन के सामने भी चुनौती होती है कि वह क्या करे?
जरूरत है कि इनके सदुपयोग की सोचे। हाल ही में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के बायोटेक्नोलॉजी विभाग की प्रोफेसर शांथि सुंदरम और नेहरू ग्राम भारती मानित विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आदि नाथ के नेतृत्व में किए गए शोध ने इस दिशा में एक नई क्रांति का सूत्रपात किया है। उन्होंने मंदिरों के अवशेष पुष्पों को ‘कचरे’ से ‘कंचन’ में बदलते हुए ऐसी हर्बल औषधियां, सौंदर्य प्रसाधन और जैव ऊर्जा उत्पाद विकसित किए हैं। यह भविष्य की अर्थव्यवस्था और स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।
भारत में प्रतिवर्ष मंदिरों जैसे धार्मिक स्थलों पर औसतन 80 करोड़ टन (800 मिलियन टन) पुष्प अर्पित किए जाते हैं। एक अनुमान के अनुसार, भारत में प्रतिदिन लगभग 300 मीट्रिक टन फूलों का कचरा निकलता है। अकेले वाराणसी और प्रयागराज जैसे धार्मिक केंद्रों से प्रतिदिन करीब 70 से 100 टन तक पूजन सामग्री और पुष्प अवशेष उत्पन्न होते हैं। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि श्रद्धा के ये पुष्प यदि सही तरीके से प्रबंधित न किए जाएं, तो ये पर्यावरण के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकते हैं।
दुर्भाग्यवश, भारत में चढ़ने वाली कुल पूजन सामग्री का एक बहुत बड़ा हिस्सा, जो लगभग 90 प्रतिशत से अधिक है, उचित उपयोग या रीसाइक्लिंग के अभाव में सीधे तौर पर बर्बाद हो जाता है। लोग इन पुष्पों को पवित्र मानते हुए कचरे के डिब्बे में नहीं डालते, बल्कि नदियों (विशेषकर गंगा और यमुना), तालाबों या खुले स्थानों पर विसर्जित कर देते हैं। आंकड़ों के अनुसार, भारत की नदियों में होने वाले कुल प्रदूषण में लगभग 16 प्रतिशत हिस्सेदारी इसी ‘धार्मिक कचरे’ की है। जब ये फूल पानी में सड़ते हैं, तो इनसे निकलने वाले कीटनाशक और रासायनिक तत्व जलीय जीव-जंतुओं के लिए घातक बन जाते हैं और पानी के ऑक्सीजन स्तर (BOD) को कम कर देते हैं।
वर्तमान में केवल पांच से आठ प्रतिशत पुष्प सामग्री का ही वैज्ञानिक या व्यावसायिक रूप से पुनर्चक्रण रिसाइकिल हो पा रहा है। कुछ प्रमुख संस्थाएं और शोधकर्ता अब इन पुष्पों से अगरबत्ती, धूपबत्ती, जैविक खाद (वर्मीकम्पोस्ट) और प्राकृतिक रंग बनाने का कार्य कर रहे हैं। हालांकि, प्रोफेसर शांथि सुंदरम और डॉ. आदि नाथ का शोध इस दायरे को और विस्तृत करता है। उन्होंने इन पुष्पों से उच्च मूल्य वाले उत्पाद जैसे हर्बल सीरम, फेस पैक, एंटी-एजिंग क्रीम और बायो-फ्यूल (जैव ऊर्जा) विकसित करने की दिशा में सफलता प्राप्त की है, जो इस सामग्री के उपयोग की दर को भविष्य में बढ़ा सकते हैं।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय और नेहरू ग्राम भारती के शोधकर्ताओं ने यह सिद्ध किया है कि मंदिरों में चढ़ने वाले गुलाब, गेंदा, गुड़हल और कमल जैसे फूलों में प्रचुर मात्रा में औषधीय गुण मौजूद होते हैं। शोध के अनुसार, इन फूलों से निकाले गए अर्क (सत) का उपयोग ऐसी हर्बल औषधियां बनाने में किया जा रहा है । यह त्वचा रोगों, घावों को भरने और तनाव कम करने में सहायक हैं। गेंदे के फूल में मौजूद ल्यूटिन और कैरोटीनॉयड जैसे तत्वों का उपयोग आंखों की रोशनी बढ़ाने वाली दवाओं और एंटीऑक्सीडेंट सप्लीमेंट्स के लिए किया जा सकता है।
सौंदर्य प्रसाधनों की दुनिया में यह शोध एक गेम-चेंजर साबित हो रहा है। मंदिरों से एकत्र किए गए फूलों को वैज्ञानिक विधियों से उपचारित कर उनसे टॉक्सिन्स (विषाक्त पदार्थ) हटाए जाते हैं और फिर उनसे प्राकृतिक इत्र, बॉडी लोशन और फेस मास्क तैयार किए जाते हैं। चूंकि ये उत्पाद पूरी तरह रासायनिक मुक्त और प्राकृतिक होते हैं, इसलिए इनकी मांग बाजार में तेजी से बढ़ रही है। यह न केवल सुंदरता निखारने का काम कर रहे हैं, बल्कि सिंथेटिक उत्पादों से होने वाले दुष्प्रभावों को भी कम कर रहे हैं।
जैव ऊर्जा के क्षेत्र में भी इन फूलों का उपयोग क्रांतिकारी है। डॉ. आदि नाथ और उनकी टीम ने शोध में पाया कि फूलों के अवशेषों से ‘बायो-एथेनॉल’ और ‘बायो-गैस’ का उत्पादन प्रभावी ढंग से किया जा सकता है। फूलों में मौजूद सेल्यूलोज को किण्वन प्रक्रिया के माध्यम से ऊर्जा में बदला जा सकता है। यह तकनीक न केवल कचरा प्रबंधन का समाधान देती है, बल्कि भविष्य के लिए एक स्वच्छ ईंधन का विकल्प भी प्रदान करती है।
इस पूरी प्रक्रिया का एक अत्यंत मानवीय और सामाजिक पक्ष भी है। मंदिर के पुष्पों पर आधारित इस उद्योग ने ग्रामीण महिलाओं और स्थानीय कारीगरों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं। जब शोध संस्थानों की तकनीक को धरातल पर उतारा जाता है, तो स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से हजारों महिलाओं को इन फूलों को इकट्ठा करने, सुखाने और उत्पाद बनाने के कार्य में लगाया जाता है। इससे न केवल पर्यावरण स्वच्छ हो रहा है, बल्कि ‘वेस्ट टू वेल्थ’ (अपशिष्ट से धन) के मंत्र के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी मजबूत हो रही है।
प्रोफेसर शांथि सुंदरम और डॉ. आदि नाथ जैसे वैज्ञानिकों का यह प्रयास हमें यह बताता है कि श्रद्धा के फूल केवल विसर्जन के लिए नहीं, बल्कि सृजन के लिए भी हैं। यदि हम तकनीक और आस्था का सही संतुलन बना लें, तो मंदिरों से निकलने वाला यह ‘पुष्प अवशेष’ हमारे स्वास्थ्य, सौंदर्य और ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने वाला एक अक्षय संसाधन बन सकता है। यह पहल न केवल हमारी नदियों को प्रदूषण से बचाएगी, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक महकती हुई मिसाल पेश करेगी।
सरकारी स्तर से इसके लिए शोध हों। दकिये गए शोध और उत्पादों को तैयार करने के लिए मंदिर क्षेत्र के आसपास के जरूरतमंद निवासियों को तैयार कर उन्हें नए व्यवसाय से जोड़ा जा सकता है। कच्चा माल उन्हें पास के मंदिर से मुफ्त या बहुत ही सस्ता मिलेगा। उसके प्रोसेस और पैंकिग आदि पर ही खर्च आएगा। अभी तक मंदिर में चढ़ाए जाने वाले पुष्प पर ही कार्य हो रहा है। पुष्पों के अलावा मंदिर में चढ़ाए जाने वाले नारियल आदि पर भी कार्य हो । उनका भी सदुपयोग हो।
अशोक मधुप
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)






