
डॉ रजनी सरीन
देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कानूनों की कोई कमी नहीं है। दुष्कर्म, घरेलू हिंसा, छेड़छाड़ और साइबर अपराधों के खिलाफ कड़े दंड, फास्ट ट्रैक कोर्ट, वन स्टॉप सेंटर और हेल्पलाइन सेवाएं मौजूद हैं। इसके बावजूद महिलाओं के खिलाफ अपराध लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं। सवाल यह है कि जब कानून मजबूत हैं, तो महिलाओं के मन में डर आज भी जिंदा क्यों है?
कानून हैं, लेकिन भरोसा कमजोर
कानून तभी प्रभावी होता है, जब पीड़ित को उस पर भरोसा हो। बड़ी संख्या में महिलाएं आज भी सामाजिक दबाव, बदनामी के डर और लंबी कानूनी प्रक्रिया के कारण शिकायत दर्ज कराने से हिचकिचाती हैं। कई मामलों में देर से न्याय या कमजोर कार्रवाई अपराधियों के हौसले बढ़ाती है।
फास्ट ट्रैक कोर्ट की व्यवस्था होने के बावजूद जमीनी स्तर पर मामलों के निपटारे में देरी महिलाओं के भरोसे को कमजोर करती है।
महिला सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती कानून नहीं, बल्कि सोच है। जब तक समाज में महिलाओं को बराबरी का दर्जा नहीं मिलेगा, तब तक सुरक्षा सिर्फ कागजों में ही सीमित रहेगी।
पीड़िता पर सवाल उठाने की प्रवृत्ति, कपड़ों या व्यवहार को दोष देना और अपराध को हल्के में लेना—ये सब मानसिकता की बीमारी के लक्षण हैं।
अपराध के बाद कार्रवाई जरूरी है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है अपराध से पहले हस्तक्षेप। परिवार, स्कूल और समाज अगर समय रहते संवेदनशीलता और सम्मान की शिक्षा दें, तो अपराध की जड़ कमजोर हो सकती है।
पुलिसिंग से आगे की जरूरत
महिला सुरक्षा सिर्फ पुलिस की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। बेहतर गश्त, त्वरित कार्रवाई और महिला हेल्प डेस्क जरूरी हैं, लेकिन इसके साथ-साथ सुरक्षित सार्वजनिक स्थल बेहतर स्ट्रीट लाइटिंग
सुरक्षित परिवहन,कार्यस्थलों पर स्पष्ट शिकायत तंत्र भी उतने ही अहम हैं।
महिला सुरक्षा की नींव शिक्षा और संस्कार से पड़ती है। बचपन से ही लड़कों को सम्मान, सहमति और बराबरी का पाठ पढ़ाना होगा। केवल बेटियों को सतर्क रहने की सीख देना समाधान नहीं है, बल्कि बेटों को जिम्मेदार नागरिक बनाना भी उतना ही जरूरी है।
सहानुभूति नहीं, अधिकार चाहिए
महिलाओं को सहानुभूति नहीं, बल्कि सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन का अधिकार चाहिए। यह अधिकार तभी साकार होगा, जब कानून, प्रशासन और समाज—तीनों अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाएं।
महिला सुरक्षा एक कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का मुद्दा है। जब तक डर अपराधी के मन में नहीं होगा और सम्मान समाज की आदत नहीं बनेगी, तब तक महिलाएं खुद को असुरक्षित महसूस करती रहेंगी।
जरूरत है ठोस कार्रवाई, संवेदनशील सोच और सामूहिक जिम्मेदारी की—तभी कानून कागज से निकलकर महिलाओं की जिंदगी में सुरक्षा बन पाएगा।
लेखक वरिष्ठ चिकित्सक और सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं।






