उमा
भारत में सामाजिक संरचना तेजी से बदल रही है। इसी बदलाव का एक बड़ा उदाहरण है लिव-इन रिलेशनशिप। महानगरों से निकलकर अब यह चलन छोटे शहरों और कस्बों तक पहुंच चुका है। समाज का एक वर्ग इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आधुनिक सोच का प्रतीक मानता है, जबकि दूसरा वर्ग इसे पारंपरिक पारिवारिक मूल्यों के लिए खतरा समझता है। लेकिन इस बहस के बीच एक गंभीर और चिंताजनक पहलू लगातार उभर रहा है—लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े अपराध।
अपराधों की बढ़ती श्रृंखला
बीते कुछ वर्षों में देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां लिव-इन रिलेशनशिप का अंत हिंसा, धोखे और हत्या तक पहुंच गया। खासतौर पर महिलाओं के खिलाफ अपराधों में चिंताजनक बढ़ोतरी देखी गई है। रिश्तों में भरोसे की कमी, भावनात्मक असुरक्षा और भविष्य को लेकर अनिश्चितता कई बार घातक रूप ले लेती है।
कई मामलों में देखा गया है कि जब महिला साथी शादी का दबाव बनाती है और पुरुष साथी इससे बचने की कोशिश करता है, तो टकराव बढ़ता है। नई प्रेम कहानी, सामाजिक दबाव या जिम्मेदारी से बचने की मानसिकता अपराध की वजह बन जाती है।
भारतीय न्याय व्यवस्था ने समय के साथ लिव-इन रिलेशनशिप को कुछ हद तक कानूनी मान्यता दी है। महिलाओं को घरेलू हिंसा कानून के तहत संरक्षण मिला है और कुछ अधिकार भी तय किए गए हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कानून की जानकारी और सामाजिक स्वीकार्यता की कमी के कारण ज्यादातर पीड़ित समय रहते मदद नहीं ले पातीं।
लिव-इन में रहने वाली महिलाएं अक्सर न तो पूरी तरह परिवार का सहारा ले पाती हैं और न ही समाज का। ऐसे में जब रिश्ता बिगड़ता है, तो वे सबसे ज्यादा असुरक्षित हो जाती हैं।
भावनात्मक परिपक्वता की कमी
विशेषज्ञ मानते हैं कि समस्या सिर्फ रिश्ते के स्वरूप की नहीं, बल्कि भावनात्मक अपरिपक्वता की है। बिना भविष्य की स्पष्ट योजना, बिना जिम्मेदारी स्वीकार किए रिश्तों में प्रवेश करना कई बार गंभीर परिणामों को जन्म देता है।
रिश्तों में संवाद की कमी, गुस्सा, शक और स्वार्थ जब हावी हो जाते हैं, तो वही रिश्ता अपराध का कारण बन जाता है। यह स्थिति पुरुष और महिला—दोनों के लिए खतरनाक साबित होती है, लेकिन इसका खामियाजा अक्सर महिलाओं को भुगतना पड़ता है।
यह समय है कि लिव-इन रिलेशनशिप को सिर्फ नैतिक बहस तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसके सामाजिक और सुरक्षा पहलुओं पर गंभीर चर्चा हो।
परिवारों को युवाओं से संवाद बढ़ाना होगा।
समाज को नैतिक जजमेंट से आगे बढ़कर सुरक्षा और सहयोग पर ध्यान देना होगा।
सरकार को जागरूकता अभियान, काउंसलिंग और कानूनी सहायता को मजबूत करना होगा।
लिव-इन रिलेशनशिप न तो अपने आप में अपराध है और न ही समाधान। यह एक सामाजिक वास्तविकता है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। लेकिन जब रिश्तों में जिम्मेदारी, पारदर्शिता और संवेदनशीलता नहीं होती, तब यही आधुनिक संबंध खतरनाक मोड़ ले लेते हैं।
जरूरत है कि युवा रिश्तों को आज़ादी के साथ-साथ जवाबदेही से भी जोड़ें, तभी समाज सुरक्षित और संतुलित रह सकेगा।






