अखिल गुप्ता
भारत में अपराध नियंत्रण और आपराधिक जांच की प्रक्रिया तेजी से बदल रही है। इस बदलाव के केंद्र में है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI)। हाल के वर्षों में पुलिस और जांच एजेंसियों द्वारा AI का उपयोग बढ़ा है, जिससे न केवल अपराधों का खुलासा तेजी से हो रहा है, बल्कि जटिल मामलों की गुत्थियां भी कम समय में सुलझाई जा रही हैं। आगरा में युवती की हत्या का खुलासा AI तकनीक से होना इसका ताजा और चर्चित उदाहरण है।
AI तकनीक के माध्यम से आज चेहरे की पहचान, सीसीटीवी फुटेज का विश्लेषण, कॉल डाटा रिकॉर्ड, लोकेशन ट्रैकिंग और सोशल मीडिया गतिविधियों की गहन जांच संभव हो पाई है। हजारों घंटों के फुटेज और लाखों डाटा रिकॉर्ड को कुछ ही मिनटों में खंगालने की क्षमता ने पुलिस की कार्यशैली को अधिक सटीक और प्रभावी बनाया है।
जहां पहले किसी अज्ञात शव की पहचान में हफ्तों लग जाते थे, वहीं अब AI आधारित फेस रिकंस्ट्रक्शन तकनीक से कुछ ही घंटों में पहचान संभव हो रही है। इससे अपराधियों तक पहुंचने का रास्ता आसान हुआ है और पीड़ित परिवारों को भी जल्द न्याय की उम्मीद बंधी है।
तकनीक के साथ बढ़ता निगरानी तंत्र
हालांकि, AI का यह बढ़ता दायरा कई गंभीर सवाल भी खड़े करता है। सबसे बड़ा सवाल है नागरिकों की निजता (प्राइवेसी) का। जब हर गतिविधि कैमरों, मोबाइल डेटा और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए ट्रैक की जा रही हो, तो आम नागरिक की निजी जिंदगी कितनी सुरक्षित है, यह चिंता का विषय बन गया है।
बिना किसी स्पष्ट कानूनी ढांचे के यदि AI आधारित निगरानी को खुली छूट दी गई, तो इसका दुरुपयोग संभव है। गलत पहचान, फर्जी संदेह और निर्दोष लोगों की निगरानी लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा बन सकती है।
कानून और जवाबदेही की कमी
भारत में अभी तक AI के उपयोग को लेकर कोई समर्पित और स्पष्ट कानून मौजूद नहीं है। किस परिस्थिति में किस हद तक डेटा का उपयोग किया जा सकता है, इसकी सीमाएं तय नहीं हैं। ऐसे में यह डर बना रहता है कि कहीं तकनीक कानून से आगे न निकल जाए।
विशेषज्ञ मानते हैं कि AI को पूरी तरह खारिज करना संभव नहीं है, क्योंकि यह समय की जरूरत बन चुका है। लेकिन इसके लिए पारदर्शी नियम, स्वतंत्र निगरानी तंत्र और मानव हस्तक्षेप अनिवार्य होना चाहिए।
AI तब ही अपराध नियंत्रण में वरदान साबित होगा, जब उसका उपयोग संविधान के दायरे में, मानव अधिकारों की रक्षा करते हुए और जवाबदेही के साथ किया जाए। तकनीक को न्याय का साधन बनाना जरूरी है, लेकिन उसे भय का उपकरण बनने से रोकना उससे भी ज्यादा जरूरी है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस निस्संदेह अपराध जांच के क्षेत्र में क्रांति ला रहा है, लेकिन यह क्रांति तभी सकारात्मक होगी जब तकनीक और अधिकारों के बीच संतुलन बना रहेगा। वरना यही तकनीक भविष्य में लोकतंत्र और निजता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकती है।

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