डॉ विजय गर्ग
आज की शिक्षा व्यवस्था अंकों, परीक्षाओं और प्रतिस्पर्धा के इर्द-गिर्द सिमटती जा रही है। बच्चे बहुत कुछ सीख रहे हैं, पर क्या वे जागरूक हो रहे हैं? क्या वे स्वयं को, समाज को और जीवन के गहरे अर्थ को समझ पा रहे हैं? यहीं से आवश्यकता जन्म लेती है—चेतना की पाठशाला की।
चेतना क्या है?
चेतना केवल सोचने की क्षमता नहीं है, बल्कि अपने विचारों, भावनाओं, कर्मों और उनके प्रभावों को समझने की जागरूकता है। चेतना वह आंतरिक प्रकाश है, जिसके बिना ज्ञान केवल सूचना बनकर रह जाता है। जब व्यक्ति यह जान पाता है कि वह क्या सोच रहा है, क्यों सोच रहा है और उसका परिणाम क्या होगा—वहीं से चेतना की शुरुआत होती है।
शिक्षा और चेतना का संबंध
वर्तमान शिक्षा हमें ‘क्या पढ़ना है’ तो सिखाती है, पर ‘कैसे जीना है’ इसका उत्तर कम देती है। गणित, विज्ञान और तकनीक जरूरी हैं, लेकिन संवेदनशीलता, करुणा, आत्म-अनुशासन और विवेक भी उतने ही आवश्यक हैं। चेतना की पाठशाला वह स्थान है जहाँ शिक्षा मनुष्य को केवल योग्य नहीं, बल्कि जिम्मेदार और मानवीय बनाती है।
कक्षा के बाहर भी चलती पाठशाला
चेतना की पाठशाला किसी भवन तक सीमित नहीं होती। यह घर, समाज, प्रकृति और जीवन के अनुभवों में चलती रहती है। एक पेड़ हमें धैर्य सिखाता है, नदी हमें निरंतरता, और असफलता हमें आत्ममंथन का अवसर देती है। जब बच्चा प्रश्न करना सीखता है—“यह सही है या नहीं?”—तब वह चेतना की पाठशाला में प्रवेश कर चुका होता है।
आत्मचिंतन: सबसे महत्वपूर्ण पाठ
चेतना का विकास आत्मचिंतन से होता है। जब हम अपने भीतर झाँकते हैं, अपनी कमजोरियों और ताकतों को स्वीकार करते हैं, तब वास्तविक सीख शुरू होती है। ध्यान, मौन, पठन और संवाद—ये सभी चेतना की पाठशाला के आवश्यक उपकरण हैं।
समाज के लिए जागरूक नागरिक
चेतन व्यक्ति भीड़ का हिस्सा नहीं बनता, बल्कि विवेक से निर्णय लेता है। वह अफवाह, हिंसा और अंधविश्वास से दूर रहता है। ऐसी चेतना-आधारित शिक्षा ही एक स्वस्थ, लोकतांत्रिक और न्यायपूर्ण समाज की नींव रख सकती है।
निष्कर्ष
आज जरूरत ऐसे विद्यालयों की नहीं, बल्कि ऐसे मानवों की है जो भीतर से जागरूक हों। चेतना की पाठशाला हमें यही सिखाती है कि शिक्षा केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवन को समझने की प्रक्रिया है। जब ज्ञान और चेतना साथ-साथ चलते हैं, तभी मनुष्य सचमुच शिक्षित कहलाता है।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब


