बयान ने पकड़ा तूल, हाईकमान तक पहुँचा मामला
भरत चतुर्वेदी
बुंदेलखंड की राजनीति इन दिनों तीखे टकराव के दौर से गुजर रही है। महोबा में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान मंत्री और चरखारी विधायक के बीच हुआ विवाद अब सड़क से निकलकर सीधे पार्टी हाईकमान तक पहुँच गया है। मंत्री के उस बयान ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर कहा था कि “राजनीति खत्म कर देंगे”। यह बयान सामने आते ही मामला गरमा गया और सियासी संघर्ष खुलकर सामने आ गया।
इस विवाद के बाद चरखारी विधायक के पिता और पूर्व सांसद गंगा चरण राजपूत खुलकर मैदान में उतर आए हैं। उन्होंने पार्टी हाईकमान को पत्र लिखकर साफ शब्दों में कहा है कि पार्टी का संविधान सभी के लिए समान है। उनका कहना है कि यदि उनके पुत्र बृजभूषण राजपूत को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है, तो विवादित बयान देने वाले मंत्री के खिलाफ भी वही कार्रवाई होनी चाहिए। पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि अनुशासन का पैमाना व्यक्ति विशेष के अनुसार नहीं बदला जाना चाहिए।
इस पूरे प्रकरण में पंकज चौधरी, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष, की भूमिका भी अहम हो गई है। उन्होंने 30 जनवरी को सरकारी कार्यक्रम के दौरान हुए मंत्री–विधायक विवाद को गंभीरता से लेते हुए चरखारी विधायक को कारण बताओ नोटिस जारी किया है और सात दिन के भीतर जवाब तलब किया है। इस कार्रवाई के बाद सियासी तापमान और बढ़ गया है। विधायक खेमे का कहना है कि उनके पास भी कई तथ्य और पत्राचार हैं, जिन्हें उचित समय पर सामने लाया जाएगा।
उधर, यह टकराव अब केवल व्यक्तिगत विवाद तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि धीरे-धीरे लोधी बनाम कर्मी की सामाजिक-पृष्ठभूमि में भी देखा जाने लगा है। हालांकि पूर्व प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह के समर्थक खुलकर सामने नहीं आ पा रहे हैं, लेकिन चरखारी विधायक के समर्थन में लोधी समाज का एक बड़ा तबका सोशल मीडिया से लेकर ज़मीनी स्तर तक सक्रिय दिखाई दे रहा है।
चरखारी विधायक खुद को बुंदेलखंड की जनता की आवाज़ बताते हुए लगातार जनसमर्थन का आह्वान कर रहे हैं। उनके इस आह्वान का असर भी दिखने लगा है और समर्थन की एक बड़ी बयार क्षेत्र में महसूस की जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद सिर्फ एक बयान या नोटिस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले समय में बुंदेलखंड की राजनीति की दिशा और समीकरण दोनों को प्रभावित कर सकता है।
कुल मिलाकर, महोबा का यह मंत्री–विधायक संघर्ष अब संगठनात्मक अनुशासन, सामाजिक समर्थन और क्षेत्रीय राजनीति—तीनों का परीक्षा-पत्र बन चुका है। अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि पार्टी हाईकमान इस सियासी टकराव को कैसे सुलझाता है और किसके पक्ष में तराजू झुकता है।


