भरत चतुर्वेदी
मनुष्य का स्वभाव है—गलती होने पर उसे सुधारना। यह प्रवृत्ति अपने आप में नकारात्मक नहीं है, बल्कि यही सीखने और आगे बढ़ने का आधार भी है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब गलती सुधारने की चाह धीरे-धीरे ज़िद में बदल जाती है, और ज़िद खुद को हर हाल में सही साबित करने की कोशिश बन जाती है।
ऐसी स्थिति में इंसान गलती से सीखने के बजाय, उसे छुपाने या सही ठहराने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा देता है। वह यह भूल जाता है कि सच क्या है, और ध्यान इस पर केंद्रित हो जाता है कि दूसरे उसे गलत न समझ लें। यही वह मोड़ होता है, जहाँ एक गलती को सुधारने की प्रक्रिया, आगे चलकर नई-नई गलतियों की जड़ बन जाती है।
परिस्थितियों को बदलने की बेचैनी
कई बार हम यह मान बैठते हैं कि अगर परिस्थितियाँ बदल जाएँ, या सामने वाला व्यक्ति बदल जाए, तो सब ठीक हो जाएगा। इसी सोच में हम बार-बार दूसरों को बदलने की कोशिश करते हैं—उनकी सोच, उनके फैसले, उनका व्यवहार। लेकिन सच्चाई यह है कि दूसरों को बदलने की ज़िद इंसान को और उलझा देती है।
जितना अधिक हम बाहर की दुनिया को अपने मुताबिक ढालना चाहते हैं, उतना ही भीतर का संतुलन बिगड़ता चला जाता है। परिणामस्वरूप, रिश्तों में तनाव बढ़ता है, मन में बेचैनी घर कर जाती है और समाधान की जगह टकराव पैदा होता है।
इसके ठीक उलट, जो लोग अपनी गलतियों को पहचान लेते हैं और उन्हें शांति से स्वीकार कर लेते हैं, वे भीतर से हल्के हो जाते हैं। गलती स्वीकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मबल का सबसे बड़ा प्रमाण है। यह मान लेना कि “हाँ, यहाँ मुझसे चूक हुई”—इंसान को बोझ से मुक्त कर देता है।
स्वीकार करने के साथ ही सुधार की राह अपने आप खुल जाती है। वहाँ न कोई दिखावा होता है, न कोई ज़िद। केवल सीख होती है, और आगे बढ़ने की स्पष्ट दिशा।
असल मुक्ति दूसरों को बदलने में नहीं, बल्कि खुद को समझने में है। जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि हम भी गलत हो सकते हैं, तब हमें सही साबित होने की ज़रूरत नहीं रहती। यही वह क्षण होता है, जब मन शांत होता है और सोच स्पष्ट।
इसलिए ज़रूरी है कि हम हर गलती को प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाएं। कुछ गलतियों को स्वीकार करना, कुछ को छोड़ देना और कुछ से सीख लेना—यही जीवन का संतुलन है।
गलती सुधारने की चाह अगर विनम्रता से जुड़ी हो, तो वह हमें बेहतर इंसान बनाती है। लेकिन जब वही चाह ज़िद और अहंकार में बदल जाती है, तो वह हमें और भटका देती है।जो अपनी गलतियों को स्वीकार कर लेता है, वही वास्तव में आगे बढ़ता है—और वही अंततः मुक्त होता है।


