भरत चतुर्वेदी
महंगाई आज देश का सबसे बड़ा और सबसे जमीनी मुद्दा बन चुकी है। यह कोई आंकड़ों की बहस नहीं, बल्कि हर घर की रसोई से जुड़ा सवाल है। दाल, सब्जी, दूध, तेल, गैस, आटा—ऐसी कोई रोजमर्रा की चीज नहीं बची है, जिसके दाम आम आदमी को न चुभते हों। आय सीमित है, लेकिन खर्च हर महीने बढ़ता जा रहा है। यही कारण है कि महंगाई अब सिर्फ आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि जीवन-शैली का संकट बन गई है।
सबसे ज्यादा मार मध्यम वर्ग और गरीब वर्ग पर पड़ रही है। नौकरीपेशा लोगों की सैलरी साल-दो साल में थोड़ी बढ़ती है, लेकिन कीमतें हर महीने नई ऊंचाई छू लेती हैं। मजदूर वर्ग की स्थिति और भी खराब है—मजदूरी वहीं की वहीं है, लेकिन खाने-पीने और रहने का खर्च लगातार बढ़ रहा है। नतीजा यह है कि परिवारों को मजबूरी में अपने खर्चों में कटौती करनी पड़ रही है।
इस कटौती का असर सबसे पहले शिक्षा और स्वास्थ्य पर पड़ता है। बच्चों की पढ़ाई के खर्च टाले जाते हैं, इलाज को नजरअंदाज किया जाता है और पोषण से समझौता होता है। दूध, फल और पौष्टिक भोजन धीरे-धीरे थाली से गायब हो रहे हैं। यह केवल वर्तमान की समस्या नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के भविष्य पर सीधा असर डालने वाली स्थिति है।
सरकार की ओर से अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि महंगाई के पीछे वैश्विक कारण हैं—अंतरराष्ट्रीय बाजार, युद्ध, कच्चे तेल के दाम, सप्लाई चेन की दिक्कतें। ये कारण अपनी जगह सही हो सकते हैं, लेकिन सवाल यह है कि घरेलू स्तर पर नियंत्रण के प्रयास कितने प्रभावी हैं। जमाखोरी, कालाबाजारी और कमजोर आपूर्ति व्यवस्था महंगाई को और भड़काती है, लेकिन इन पर कार्रवाई अक्सर नाकाफी नजर आती है।
महंगाई का असर केवल जेब तक सीमित नहीं रहता, यह सामाजिक तनाव भी पैदा करती है। जब घर का बजट बिगड़ता है तो परिवारों में तनाव बढ़ता है, कर्ज लेने की मजबूरी आती है और असंतोष जन्म लेता है। यही असंतोष धीरे-धीरे गुस्से और निराशा में बदलता है, जो समाज और लोकतंत्र दोनों के लिए खतरनाक संकेत है।
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार महंगाई को सिर्फ रिपोर्ट और प्रतिशत के नजरिये से न देखे, बल्कि रसोई की हकीकत को समझे। राहत पैकेज, सब्सिडी, सस्ती गैस, सस्ती दाल और जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर वास्तविक नियंत्रण—ये सब केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि जमीनी क्रियान्वयन मांगते हैं।
साफ बात यह है कि जब तक आम आदमी की थाली हल्की रहेगी, तब तक विकास के बड़े-बड़े दावे खोखले ही माने जाएंगे। विकास वही है, जो महंगाई के बोझ को कम करे, न कि उसे नजरअंदाज कर आगे बढ़ने का दावा करे।

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