जवाहर सिंह गंगवार
आज का समाज किसी दर्शन या किताब की भाषा में नहीं, बल्कि ज़मीनी सच्चाई में दो हिस्सों में बंटा दिखता है—लुटेरा और कमेरा। यह विभाजन न जाति का है, न धर्म का, न क्षेत्र का। यह फर्क है मेहनत करने वालों और मेहनत का फल लूटने वालों के बीच।
कमेरा वह है जो सुबह घर से निकलता है और शाम को थका-हारा लौटता है। किसान खेत में हल चलाता है, मजदूर ईंट उठाता है, कर्मचारी दफ्तर में फाइल घुमाता है, छोटा दुकानदार रोज़ का हिसाब जोड़ता है। यही लोग उत्पादन करते हैं, टैक्स देते हैं, नियम मानते हैं और व्यवस्था पर भरोसा रखते हैं।
कमेरा ज्यादा नहीं मांगता। उसे बस समय पर मजदूरी, बच्चों की पढ़ाई, इलाज की सुविधा और सुरक्षित भविष्य चाहिए। लेकिन उसके हिस्से में अक्सर महंगाई, बेरोजगारी, कर्ज और अपमान आता है। वह लाइन में खड़ा रहता है, फॉर्म भरता है, दफ्तरों के चक्कर काटता है—और फिर भी न्याय नहीं मिलता।
लुटेरा: जो सिस्टम से खेलता है
लुटेरा वह है जो पसीना नहीं बहाता, बल्कि सिस्टम की कमजोरी पहचानता है। वह नियमों को तोड़ता नहीं, बल्कि मोड़ता है। कहीं रिश्वत, कहीं दलाली, कहीं ठेके, कहीं कमीशन, कहीं टैक्स चोरी—यही उसकी कमाई के रास्ते हैं।
लुटेरा अक्सर सत्ता के आसपास रहता है। कानून उसके लिए सख्त नहीं, लचीला होता है। गलती हो जाए तो मामला दब जाता है, जांच धीमी हो जाती है या समझौता हो जाता है। संकट आए तो उसे राहत मिलती है, जबकि कमेरा सब कुछ सहने के लिए छोड़ दिया जाता है।
समस्या यह नहीं कि लुटेरे मौजूद हैं। समस्या यह है कि समाज ने लूट को स्वीकार करना शुरू कर दिया है। आज ईमानदार आदमी को बेवकूफ और भ्रष्ट को चालाक कहा जाता है। मेहनत को कमजोरी और शॉर्टकट को समझदारी माना जाने लगा है।इसका सबसे बुरा असर युवाओं पर पड़ता है। जब वे देखते हैं कि मेहनत करने वाला पीछे है और लूटने वाला आगे, तो उनका भरोसा टूटता है। वे सोचने लगते हैं कि सही रास्ते पर चलने का कोई फायदा नहीं।
लुटेरा इसलिए ताकतवर है क्योंकि उस पर जवाबदेही नहीं है। कानून बराबर नहीं है, कार्रवाई चुनिंदा है और सजा मिलने की संभावना कम है। दूसरी तरफ कमेरा कमजोर है क्योंकि उसके पास न ताकत है, न समय और न ही मजबूत आवाज।
यह केवल आर्थिक असमानता नहीं, बल्कि न्याय की असमानता है।
समाधान साफ़ है,मेहनत करने वाले को सुरक्षा और सम्मान मिले,
लूट करने वाले पर सख्त और निष्पक्ष कार्रवाई हो,कानून सबके लिए बराबर लागू हों,ईमानदारी को मजबूरी नहीं, ताकत बनाया जाए।
समाज तभी आगे बढ़ता है जब कमाने वाला सुरक्षित और लूटने वाला डर में हो। अगर लुटेरा हावी होता गया, तो एक दिन कमेरा टूट जाएगा। और जब कमेरा टूटता है, तो समाज और देश दोनों कमजोर पड़ जाते हैं।सीधी बात है,लुटेरे के बिना समाज चल सकता है,लेकिन कमेरे के बिना समाज कभी नहीं चल सकता।






