
शरद कटियार
उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना को यदि आंकड़ों के आईने में देखा जाए तो एक तस्वीर साफ़ उभरकर सामने आती है। राज्य की कुल आबादी में लगभग 85 फीसदी वह वर्ग है, जिसे परंपरागत रूप से वंचित, पिछड़ा या हाशिये पर खड़ा समाज कहा जाता है। इस 85 फीसदी में करीब 60 फीसदी हिस्सा ओबीसी वर्ग का है, जिसमें लगभग 12 फीसदी यादव, 10 फीसदी कुर्मी, 6 फीसदी लोधी और शेष अन्य पिछड़ी जातियां शामिल हैं। इसके अलावा दलित, मुस्लिम और अन्य सामाजिक समूह भी इसी व्यापक सामाजिक बहुमत का हिस्सा हैं।
राजनीति का सामान्य नियम कहता है कि जहां संख्या अधिक होती है, वहां सत्ता का आधार भी वहीं होना चाहिए। लेकिन उत्तर प्रदेश की मौजूदा राजनीति इस नियम को उलटती हुई दिखाई देती है। यहां बहुमत को सत्ता का स्रोत बनाने के बजाय, बहुमत को आपसी बहस, टकराव और अंतर्विरोधों में उलझाए रखने की रणनीति ज्यादा प्रभावी दिखाई देती है।
पिछले कुछ वर्षों के राजनीतिक घटनाक्रमों को देखें तो यह पैटर्न बार-बार सामने आता है। कभी यूजीसी के नियमों का मुद्दा उठता है, पहले पिछड़े वर्गों को छूट की बात होती है, फिर अचानक नियम स्थगित कर दिए जाते हैं। बहस शुरू होती है, लेकिन निष्कर्ष गायब हो जाता है। कभी ईडब्ल्यूएस का मुद्दा उछलता है, कभी आरक्षण को लेकर सवाल खड़े किए जाते हैं। कभी ओबीसी बनाम सवर्ण की बहस को हवा दी जाती है, तो कभी ओबीसी के भीतर ही उपजातीय टकराव को मंच दिया जाता है।
इसी क्रम में केशव प्रसाद मौर्य के खिलाफ आरक्षण और प्रतिनिधित्व को लेकर घेराव होता है, तो दूसरी ओर स्वतंत्र देव सिंह और ब्रजभूषण राजपूत जैसे मामलों में सड़क पर घमासान देखने को मिलता है। हर बार कोई नया प्रकरण सामने आता है, बहस तेज़ होती है, सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक शोर मचता है, लेकिन कुछ समय बाद मामला ठंडा पड़ जाता है और असली सवाल पीछे छूट जाते हैं।
यदि केवल वर्तमान समय में ओबीसी राजनीति को देखा जाए, तो सबसे दिलचस्प स्थिति कुर्मी समाज में दिखाई देती है। सत्ता संरचना में कुर्मी समाज से जुड़े कुछ नेताओं को मंत्री पद, संगठनात्मक ताकत और राजनीतिक लाभ मिले हैं। स्वतंत्र देव सिंह, राकेश सचान और आशीष पटेल जैसे नाम सत्ता के भीतर प्रभावशाली भूमिका में हैं। इससे यह संदेश जाता है कि ओबीसी को प्रतिनिधित्व मिल रहा है।
लेकिन इसी के समानांतर ओबीसी समाज का बड़ा हिस्सा आपसी बहसों में उलझा हुआ है। कहीं हिंदुत्व बनाम सामाजिक न्याय की बहस चल रही है, तो कहीं ओबीसी बनाम सवर्ण का नैरेटिव आगे बढ़ाया जा रहा है। कहीं यादव बनाम गैर-यादव की राजनीति है, तो कहीं कुर्मी बनाम अन्य पिछड़ी जातियों की तुलना। यह बहसें वास्तविक मुद्दों—जैसे शिक्षा, रोजगार, प्रतिनिधित्व, नीति निर्माण और संसाधनों की हिस्सेदारी—से ध्यान हटाती दिखाई देती हैं।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह एक परिचित रणनीति है। जब बहुसंख्यक सामाजिक वर्ग एकजुट होकर सवाल पूछने लगे, तो सत्ता के लिए असुविधा पैदा होती है। लेकिन जब वही वर्ग आपसी पहचान, प्रतीक और वैचारिक टकराव में बंटा रहे, तो सत्ता अपेक्षाकृत सहज रहती है। बहस चलती रहती है, लेकिन दिशा बदल जाती है।
यह कहना जरूरी है कि इन बहसों में शामिल सभी लोग सत्ता संरचना के हिस्सेदार नहीं हैं। लड़ने और आवाज़ उठाने वाले चंद लोग हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल बड़े राजनीतिक नैरेटिव के निर्माण में हो जाता है। आम ओबीसी, दलित या अल्पसंख्यक मतदाता रोज़मर्रा की समस्याओं—महंगाई, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य—से जूझता रहता है, जबकि राजनीतिक विमर्श उसे अलग-अलग खांचों में बांटने में लगा रहता है।
इस पूरे परिदृश्य में सवाल किसी एक व्यक्ति या समाज का नहीं है। सवाल यह है कि क्या 60 फीसदी आबादी की राजनीति केवल आपसी टकराव तक सीमित रह जाएगी, या वह साझा मुद्दों पर संगठित होकर सत्ता से जवाब मांगेगी। उत्तर प्रदेश की राजनीति का भविष्य इसी सवाल के जवाब में छिपा है।
तथ्य यही बताते हैं कि जब तक बहुमत आपसी बहस में उलझा रहेगा, तब तक सत्ता संरचना में वास्तविक संतुलन नहीं बदलेगा। राजनीति में प्रतिनिधित्व केवल चेहरों से नहीं, बल्कि नीतियों और फैसलों से तय होता है। और यह तभी संभव है, जब संख्या अपनी ताकत को पहचाने और उसे मुद्दों की राजनीति में बदले।
यह लेख किसी समाज के खिलाफ नहीं, बल्कि उस राजनीतिक प्रक्रिया के विश्लेषण का प्रयास है, जिसमें बहुमत को बहस में और सत्ता को सुविधा में रखा जाता है। सवाल यही है—क्या आने वाले समय में यह समीकरण बदलेगा, या फिर 85 फीसदी की राजनीति यूं ही 60 फीसदी को उलझाए रखने तक सीमित रहेगी।
लेखक यूथ इंडिया न्यूज़ ग्रुप के संस्थापक हैँ


