शरद कटियार
गृह मंत्री अमित शाह की ओर से यह कहा जाना कि “पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई है” और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का यह कहना कि “हम प्रकाशित किताब और किसी मेल पर भी चर्चा नहीं करेंगे”—असल मुद्दे से ध्यान हटाने का तरीका लगता है। सवाल किताब का नहीं है और न ही किसी मेल का। सवाल यह है कि क्या संसद अब उन विषयों पर चर्चा करेगी, जिन पर सत्ता सहज महसूस करे, या फिर उन मुद्दों पर भी, जो असहज हों लेकिन देशहित से जुड़े हों?
देश यह नहीं पूछ रहा कि किताब छपी या नहीं।
देश यह भी नहीं पूछ रहा कि मेल आधिकारिक है या नहीं।
देश का सीधा सवाल यह है कि जब चीन भारतीय सीमा में घुसपैठ कर रहा था, तब सरकार का वास्तविक स्टैंड क्या था—प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री ने क्या कहा, क्या किया और क्या नहीं किया।
यह सवाल किसी दल का नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा का है।
लोकसभा बहस के लिए होती है। सवाल पूछने के लिए होती है। जवाबदेही तय करने के लिए होती है। अगर संसद में यह कहा जाए कि किसी विषय पर इसलिए चर्चा नहीं होगी क्योंकि वह “अप्रकाशित” है या किसी “मेल” से जुड़ा है, तो यह लोकतांत्रिक परंपराओं को कमजोर करता है। सच यह है कि संसद में चर्चा का आधार विषय की प्रासंगिकता होती है, न कि उसका फॉर्मेट।
अगर किताब में लिखी बातें तथ्यात्मक रूप से गलत हैं, तो सरकार को संसद में खड़े होकर तथ्यों के साथ उन्हें गलत साबित करना चाहिए। अगर किसी मेल की बात निराधार है, तो उसे सार्वजनिक रूप से खारिज करना चाहिए। लेकिन चर्चा से इनकार करना जवाब नहीं होता। चर्चा से इनकार करना केवल संदेह को जन्म देता है।
लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण होती है। उनका दायित्व सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन बनाए रखना और यह सुनिश्चित करना होता है कि संसद सुचारु चले तथा जनता के सवालों को जगह मिले। स्पीकर का पद किसी भी सरकार के लिए ढाल नहीं होता। जब स्पीकर यह कहते हैं कि “किसी मेल पर भी चर्चा नहीं होगी”, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अब राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे भी तकनीकी कारणों से बाहर कर दिए जाएंगे?
इस पूरे मामले में सबसे गंभीर बात यह है कि सवाल पूछने वालों पर ही संदेह खड़ा किया जा रहा है। सीमा सुरक्षा पर सवाल करना ग़द्दारी नहीं है। बल्कि, ऐसे सवाल लोकतंत्र की मजबूती का संकेत होते हैं। इतिहास बताता है कि जब सरकारें पारदर्शी होती हैं, तो वे बहस से नहीं डरतीं। डर तब पैदा होता है, जब रिकॉर्ड और बयान आपस में मेल नहीं खाते।
देश को यह जानने का अधिकार है कि सीमा पर क्या हुआ, सरकार ने उस समय क्या कहा और क्या निर्णय लिए गए। यह अधिकार किसी नेता की कृपा से नहीं मिलता, यह संविधान से मिलता है। लोकतंत्र में पारदर्शिता बहस से आती है, बहानों से नहीं।
आज मामला किताब या मेल का नहीं है। आज मामला यह है कि क्या संसद सवाल पूछेगी या सवालों से बचेगी। अगर संसद ही राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर खुली चर्चा से पीछे हटेगी, तो जनता का भरोसा कमजोर होना तय है।
निष्कर्ष सीधा है लोकतंत्र में सच से भागने का कोई सुरक्षित रास्ता नहीं होता। सवाल दबाए जा सकते हैं, लेकिन खत्म नहीं किए जा सकते। देश सवाल पूछेगा, क्योंकि यह उसका अधिकार है। और जब तक जवाब स्पष्ट रूप से नहीं दिए जाते, तब तक ये सवाल बने रहेंगे।






