राघवेंद्र सिंह, राजू
राजनीति केवल शासन की कला नहीं होती, बल्कि वह समाज के बदलते स्वरूप का प्रतिबिंब भी होती है।
एक अर्थशास्त्र और कानून के विद्यार्थी के रूप में मैंने राजनीति को हमेशा सत्ता और संघर्ष की सीमाओं से आगे—एक जीवंत, गतिशील प्रणाली के रूप में देखा है। वर्ष 2014 में जब मैंने इस विषय पर लिखा था, तब वह विश्लेषण विचारों और प्रवृत्तियों पर आधारित था। लेकिन आज 2026 में, जब उसी लेख को दोबारा पढ़ता हूँ, तो यह एहसास और गहरा हो जाता है कि तब जो अनुमान थे, वे आज की राजनीतिक सच्चाई बन चुके हैं।
आंदोलनों से बाहुबल तक
स्वतंत्रता के बाद भारतीय राजनीति लंबे समय तक विचारधारा, आंदोलनों और जनसंघर्षों के इर्द-गिर्द घूमती रही। लेकिन 1970 के दशक से सत्ता प्राप्त करने के लिए बाहुबल और दबंगई का सहारा बढ़ने लगा। यहीं से राजनीति का अपराधीकरण शुरू हुआ।
1990 के दशक तक आते-आते स्थिति यह हो गई कि अपराधी न केवल राजनीति को प्रभावित कर रहे थे, बल्कि वे स्वयं नेता बनने लगे। उस समय मैंने इसे “अपराध का राजनीतिकरण” कहा था।
2014 के लोकसभा चुनाव भारतीय राजनीति के लिए एक नया मोड़ लेकर आए। अब नेता केवल किसी विचारधारा या पार्टी के प्रतिनिधि नहीं रहे, बल्कि उन्हें एक ब्रांड की तरह गढ़ा जाने लगा।
टेक्नोक्रेट्स, डिजिटल रणनीतिकार और कॉर्पोरेट ब्रांडिंग विशेषज्ञ मिलकर नेताओं की आदमकद छवि तैयार करने लगे। सोशल मीडिया, टीवी प्रचार, डेटा एनालिटिक्स और माइक्रो-टारगेटिंग के ज़रिए नेताओं को ‘विकास पुरुष’ या ‘सुशासन का प्रतीक’ के रूप में प्रस्तुत किया गया।
2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में रणनीति और प्रबंधन की इस राजनीति का असर और स्पष्ट हुआ। उसी दौर में रणनीतिकारों की भूमिका पर सार्वजनिक चर्चा बढ़ी और यह कहा जाने लगा कि 2014 की जीत के पीछे जिन दिमागों ने काम किया, वही आगे की राजनीति की दिशा तय करेंगे।
तब मैंने यह अनुमान लगाया था कि भविष्य में ये टेक्नोक्रेट्स स्वयं भी राजनीतिक मैदान में उतर सकते हैं—और इस प्रवृत्ति को मैंने “तकनीक का राजनीतिकरण” कहा था।
2019 के बाद यह बात लगभग अक्षरशः सही सिद्ध होती दिखी। जिन डिजिटल औज़ारों, डेटा-आधारित रणनीतियों और नैरेटिव बिल्डिंग से दूसरों के लिए राजनीतिक ज़मीन तैयार की गई थी, अब वही औज़ार अपने लिए राजनीतिक करियर गढ़ने में इस्तेमाल होने लगे।
डिजिटल इकोसिस्टम अब केवल प्रचार का माध्यम नहीं रहा—वह नेतृत्व निर्माण की फैक्ट्री बन चुका है। जनमानस की नब्ज पकड़ने वाले डेटा टूल्स, भावनात्मक अपील और सोशल नैरेटिव के सहारे अब टेक्नोक्रेट्स खुद को नेता के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
इस पूरे परिवर्तन के बीच कुछ बुनियादी सवाल हमारे सामने खड़े हैं—क्या राजनीति अब विचारों की जगह केवल इमेज और मैनेजमेंट का खेल बन जाएगी?
क्या दलों की वैचारिक परंपराएँ कॉर्पोरेट शैली के चुनावी अभियानों में विलीन हो जाएँगी?
और क्या जनता केवल प्रचारित छवियों को ही सत्य मान लेगी?
2014 में किया गया मेरा विश्लेषण आज एक भविष्यवाणी जैसा प्रतीत होता है। तकनीक ने न केवल छवियाँ गढ़ीं, बल्कि उन्हें सत्ता तक पहुँचाने की शक्ति भी हासिल कर ली।
यह बदलाव युवाओं के लिए अवसर हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चुनौती भी है।
अब ज़रूरत इस बात की है कि हम छवियों से आगे बढ़कर विचारों की वापसी की माँग करें।
क्योंकि जब राजनीति विचारहीन ब्रांडिंग में बदल जाती है, तब लोकतंत्र केवल एक प्रबंधित तमाशा बनकर रह जाता है।
लेखक, राजनैतिक विश्लेषक हैँ।

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