सवर्ण असंतोष से यूपी में बिगड़ सकता है भाजपा का राजनीतिक संतुलन?
राघवेंद्र सिंह राजू
केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नई बेचैनी पैदा कर दी है। खासतौर पर सवर्ण समाज में इन नियमों को लेकर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। जिस वर्ग को अब तक भारतीय जनता पार्टी का मजबूत और भरोसेमंद आधार माना जाता रहा है, उसी के भीतर उठती नाराजगी भाजपा के लिए चेतावनी की घंटी बनती दिख रही है।
यूजीसी के नए प्रावधानों को लेकर यह धारणा बन रही है कि इससे उच्च शिक्षा संस्थानों में परंपरागत नियुक्ति, पदोन्नति और प्रतिनिधित्व संतुलन प्रभावित होगा। सवर्ण समाज का एक बड़ा तबका मानता है कि ये नियम उनके अवसरों को सीमित करने वाले हैं। यही कारण है कि सोशल मीडिया से लेकर विश्वविद्यालय परिसरों तक विरोध की आवाज़ें सुनाई देने लगी हैं।
उत्तर प्रदेश में भाजपा की राजनीतिक ताकत का बड़ा आधार सामाजिक संतुलन रहा है, जिसमें सवर्ण, पिछड़ा और अन्य वर्गों का साझा समर्थन निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। लेकिन यदि सवर्ण समाज का यह असंतोष गहराता है, तो इसका सीधा असर भाजपा के सियासी गणित पर पड़ सकता है। खासकर ऐसे समय में, जब विपक्ष पहले से ही सरकार को सामाजिक मुद्दों पर घेरने में जुटा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह मुद्दा केवल शिक्षा नीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जल्द ही राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन सकता है। विपक्षी दल पहले ही इसे भाजपा की “वर्ग विशेष की अनदेखी” के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। यदि यह नैरेटिव मजबूत होता है, तो भाजपा को अपने पारंपरिक समर्थक वर्ग को साधने में अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ेगी।
भाजपा के सामने अब चुनौती दोहरी है—एक ओर वह सामाजिक न्याय और समावेशन की नीति को आगे बढ़ाना चाहती है, वहीं दूसरी ओर उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उसका परंपरागत समर्थक आधार खुद को उपेक्षित न महसूस करे। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और राजनीतिक रूप से निर्णायक राज्य में संतुलन बिगड़ना किसी भी दल के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
कुल मिलाकर, यूजीसी नियमों को लेकर उपजा यह असंतोष अगर समय रहते संवाद और संतुलित फैसलों से नहीं संभाला गया, तो यह मुद्दा आने वाले समय में भाजपा के लिए राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकता है। सवाल यही है कि क्या सरकार इस नाराजगी को गंभीरता से लेकर समाधान की राह निकालेगी, या फिर यह असंतोष धीरे-धीरे चुनावी चुनौती में बदल जाएगा?
लेखक राजनीतिक विश्लेषक भी हैं।

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