ॐ नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥
भारतीय सनातन परंपरा में शनि केवल एक ग्रह नहीं, बल्कि न्याय, संतुलन और कर्मफल का जीवंत प्रतीक हैं। शनि न तो जल्द फल देते हैं और न ही बिना कारण दंड। वे केवल यह सुनिश्चित करते हैं कि कर्म का हिसाब बराबर हो। इसी सत्य को एक पंक्ति में समेटा जाए, तो वह है—
“अति के बाद क्षति तय है।”
अति: जब सीमा टूटती है
इतिहास गवाह है—चाहे सत्ता हो, धन हो, पद हो या अहंकार—
जब कोई व्यक्ति मर्यादा की सीमा लांघता है,
जब शक्ति संवेदना से अलग हो जाती है,
और जब निर्णय न्याय के बजाय अहं से लिए जाने लगते हैं—
तब अति जन्म लेती है।
अति का स्वरूप कई रूपों में दिखता है—
विरोध की आवाज़ को कुचलना
अपने ही लोगों को कमजोर करना
सत्य को दबाकर झूठ को पालना
शुरुआत में यह सब सफलता जैसा लगता है,
लेकिन शनि की दृष्टि में यह केवल परीक्षा की घड़ी होती है।
क्षति: शनि की शांत लेकिन निर्णायक चोट
शनि कभी शोर नहीं करते।
वे न बिजली गिराते हैं, न तूफान लाते हैं।
वे बस समय को अपना हथियार बनाते हैं।
जब क्षति आती है—
प्रतिष्ठा चुपचाप ढहती है
समर्थक दूरी बनाने लगते हैं
सत्ता रहते हुए भी व्यक्ति अकेला हो जाता है
और जो कल तक अजेय था, वह अचानक अप्रासंगिक हो जाता है
यही शनि का न्याय है—
न व्यक्तिगत द्वेष, न पक्षपात—
केवल कर्म के अनुसार परिणाम।
दिग्गजों का भ्रम
अक्सर यह माना जाता है कि
“हम बहुत बड़े हैं, हमें कौन छुएगा?”लेकिन शनि के दरबार में
दिग्गज और साधारण में कोई अंतर नहीं।यहां केवल कर्म देखे जाते हैं।
इतिहास, राजनीति, प्रशासन—हर क्षेत्र में ऐसे नाम दर्ज हैं
जो अपने शिखर पर थे,लेकिन अति ने उन्हें क्षण भर में क्षति की ओर धकेल दिया।
शनि का संदेश: ठहराव ही सुरक्षा है
शनि सिखाते हैं धीमे चलो, लेकिन सही चलो शक्ति रखो, पर विनम्रता के साथ निर्णय लो, पर न्याय के आधार पर विरोध सुनो, क्योंकि वही सत्य का दर्पण है जो यह सीख लेता है,उसके लिए शनि दंड नहीं, संरक्षक बन जाते हैं।
यह श्लोक केवल पूजा का मंत्र नहीं,
यह जीवन और सत्ता का संविधान है।अति के बाद क्षति तय है
आप कितने ही बड़े दिग्गज क्यों न हों।जो समय रहते रुक गया,
वही बच गया।और जो नहीं रुका—
उसके लिए शनि ने सिर्फ कर्म का हिसाब पूरा किया।
✍️ — विचार लेख | यूथ इंडिया

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