भरत चतुर्वेदी
एक समय था जब भारत का युवा बदलाव की अगुवाई करता था। आज़ादी की लड़ाई से लेकर सामाजिक आंदोलनों तक, युवा ही सबसे आगे खड़ा दिखता था। वह सवाल पूछता था, सत्ता को चुनौती देता था और नई दिशा तय करता था। लेकिन आज वही युवा राजनीति से दूरी बनाता जा रहा है। उसके मन में यह धारणा गहराती जा रही है कि राजनीति गंदी है, बेकार है और आम आदमी—खासकर युवाओं—के लिए नहीं है। यही सोच आज के समय का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक खतरा बनती जा रही है।
राजनीति से मोहभंग की वजहें
आज का युवा जब राजनीति की ओर देखता है, तो उसे वहां वादे ज़्यादा और परिणाम कम दिखाई देते हैं। भ्रष्टाचार, अवसरवाद, आरोप-प्रत्यारोप और सत्ता की लड़ाई ने राजनीति की छवि को नुकसान पहुंचाया है। युवा को लगता है कि उसकी आवाज़ की कोई अहमियत नहीं, फैसले पहले से तय होते हैं और वोट केवल औपचारिकता है।
इसके साथ ही, शिक्षा और रोजगार की अनिश्चितता ने भी युवाओं को राजनीति से दूर किया है। जो युवा अपने भविष्य को लेकर संघर्ष कर रहा है, उसके लिए राजनीतिक भागीदारी अक्सर “समय की बर्बादी” जैसी लगने लगती है।
आज का युवा पूरी तरह राजनीतिक रूप से उदासीन नहीं है—वह मुद्दों को समझता है, बहस करता है और प्रतिक्रिया भी देता है। लेकिन यह सब अक्सर सोशल मीडिया की सीमाओं तक सिमट जाता है। ट्वीट, पोस्ट और कमेंट के जरिए गुस्सा निकल जाता है, लेकिन ज़मीनी भागीदारी नहीं बन पाती।
यही वह बिंदु है जहां असली समस्या पैदा होती है। डिजिटल बहस वास्तविक लोकतांत्रिक हस्तक्षेप का विकल्प नहीं हो सकती। जब राजनीति स्क्रीन तक सीमित हो जाती है, तो फैसले सड़क, संसद और सचिवालय में वही लोग लेते हैं, जिनका भविष्य उतना दांव पर नहीं होता जितना युवाओं का।
हर युवा मुद्दा, राजनीतिक मुद्दा है
बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था, महंगाई, स्टार्टअप कल्चर, डिजिटल अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता—ये सभी सीधे-सीधे राजनीतिक फैसलों से जुड़े मुद्दे हैं। जब युवा राजनीति से दूर रहता है, तो वह अनजाने में इन मुद्दों पर अपना अधिकार छोड़ देता है।
राजनीति से दूरी बनाना तटस्थ रहना नहीं है, बल्कि यह दूसरों को निर्णय लेने की खुली छूट देना है।
वोट: सबसे अनदेखी ताकत
युवा वर्ग देश का सबसे बड़ा वोट बैंक है, लेकिन मतदान प्रतिशत में उसकी भागीदारी अक्सर निराशाजनक रहती है। जब युवा वोट नहीं करता, तो सत्ता वही तय करते हैं जो संगठित हैं, सक्रिय हैं और अपनी बात रखने में पीछे नहीं हटते।युवा को यह समझना होगा कि वोट केवल अधिकार नहीं, जिम्मेदारी भी है। एक-एक वोट नीतियों की दिशा बदल सकता है, लेकिन उसके लिए जागरूकता और भरोसा दोनों चाहिए।
यह मान लेना कि “राजनीति खराब है, इसलिए उससे दूर रहेंगे” अपने आप में एक खतरनाक सोच है। बदलाव बाहर से नहीं आता, वह भीतर से आता है। राजनीति को बेहतर बनाने का एक ही रास्ता है—उसमें बेहतर लोग आगे आएं। और बेहतर लोग तभी आएंगे, जब युवा आगे आएगा।
युवा अगर सवाल नहीं पूछेगा, तो उसके लिए कोई और सवाल तय करेगा।युवा अगर चुप रहेगा, तो उसके हिस्से का भविष्य कोई और लिखेगा—और शायद गलत लिखेगा।
लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, वह नागरिकों की सतत भागीदारी से मजबूत होता है। आज जरूरत है कि युवा राजनीति को नकारे नहीं, बल्कि उसे बदले। सवाल पूछे, संगठित हो, वोट को ताकत समझे और अपनी हिस्सेदारी निभाए।
क्योंकि जिस दिन युवा राजनीति से जुड़ गया, उसी दिन लोकतंत्र को नई जान मिल जाएगी।






