यूथ इंडिया
25 साल तक ज़िंदगी एक रफ्तार होती है। हर सुबह किसी नए सपने के साथ शुरू होती है और हर रात इस भरोसे के साथ खत्म होती है कि कल सब बेहतर होगा। इस उम्र तक इंसान को लगता है कि उसके पास समय अनंत है, मौके असीम हैं और असफलता केवल एक अस्थायी पड़ाव। यही वह दौर है, जब ज़िंदगी दौड़ती है और इंसान उसे पकड़ने की कोशिश करता है।
25 तक सोच तेज़ होती है। फैसले जल्दी लिए जाते हैं और उनके नतीजों पर ज़्यादा ठहरकर सोचा नहीं जाता। पढ़ाई, करियर, दोस्ती, प्रेम—सब कुछ उत्साह और जुनून से भरा होता है। इस उम्र में व्यक्ति खुद को दुनिया का केंद्र समझने लगता है और मान लेता है कि मेहनत के आगे कुछ भी टिक नहीं सकता। सपनों की कीमत नहीं पूछी जाती, बस उन्हें पूरा करने की जिद होती है।
लेकिन 25 के बाद ज़िंदगी का चेहरा बदलने लगता है। अब केवल सपने नहीं रहते, उनके साथ जिम्मेदारियां भी आ खड़ी होती हैं। काम सिर्फ़ पसंद का नहीं, ज़रूरत का भी होने लगता है। रिश्तों में भावनाओं के साथ समझौते जुड़ जाते हैं और फैसलों में दिल के साथ दिमाग की हिस्सेदारी बढ़ जाती है। यही वह मोड़ है, जहां तेज़ी धीरे-धीरे ठहराव में बदलती है।
इस उम्र के बाद इंसान समझने लगता है कि हर कोशिश सफल नहीं होती और हर रास्ता मंज़िल तक नहीं पहुंचता। यहां ज़िंदगी सिखाती है कि असफलता हार नहीं, बल्कि सीख है। अब सवाल यह नहीं रहता कि “मैं क्या बनूंगा”, बल्कि यह होता है कि “मैं इस हालात में कैसे टिकूंगा”।
25 के बाद ज़िंदगी गहराती है। अनुभव सपनों की जगह लेने लगते हैं और उम्मीदें वास्तविकता से समझौता करना सीखती हैं। यह वह दौर है, जब इंसान दूसरों को नहीं, खुद को समझने की कोशिश करता है। और यहीं से ज़िंदगी सचमुच शुरू होती है—शांत, जिम्मेदार और थोड़ी थकी हुई, लेकिन कहीं ज़्यादा सच्ची।
तेज़ी से समझ तक: 25 के बाद का सच
जवानी का पहला हिस्सा तेज़ रफ्तार का नाम है। 25 की उम्र तक इंसान को लगता है कि दुनिया उसके इंतज़ार में है। सपनों को पूरा करने की हड़बड़ी होती है और हर दिन खुद को साबित करने की चुनौती। इस दौर में जीवन सीधा और सरल लगता है—मेहनत करो, आगे बढ़ो और जीत हासिल करो।
लेकिन जैसे ही उम्र 25 के पार जाती है, ज़िंदगी सवाल पूछने लगती है। अब सफलता का मतलब सिर्फ़ आगे बढ़ना नहीं रह जाता, बल्कि टिके रहना भी उतना ही ज़रूरी हो जाता है। जिम्मेदारियां कंधों पर उतर आती हैं और समय की कीमत समझ में आने लगती है।
यहां आकर इंसान जानता है कि तेज़ी हर समस्या का हल नहीं होती। कुछ फैसले सोचकर लेने पड़ते हैं, कुछ सपनों को छोड़ना पड़ता है और कुछ रिश्तों को बचाने के लिए खुद से लड़ना पड़ता है। यही वह समय है, जब ज़िंदगी भावनाओं से ज़्यादा समझ मांगती है।
25 के बाद का जीवन कम चमकदार ज़रूर होता है, लेकिन ज़्यादा सच्चा होता है। यहां उम्मीदें छोटी होती हैं, पर उनकी अहमियत कहीं ज़्यादा होती है। इंसान अब भविष्य को जीतने की नहीं, उसे समझने की कोशिश करता है।
अंततः यही समझ आती है कि 25 तक तेज़ी ज़रूरी थी, क्योंकि उसने हमें चलना सिखाया। और 25 के बाद ज़िंदगी ज़रूरी है, क्योंकि वह हमें ठहरकर जीना सिखाती है।

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